Ranchi/Kolkata
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पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालने के महज तीन महीने बाद ही शुभेंदु अधिकारी सरकार को जादवपुर विश्वविद्यालय में हुई हिंसा ने मुश्किल में डाल दिया है। विश्वविद्यालय परिसर में छात्र संगठनों के बीच टकराव के बाद अब भाजपा के भीतर ही इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग सुर सामने आने लगे हैं। जादवपुर की भाजपा विधायक सरबरी मुखर्जी ने अचानक अपने तेवर बदलते हुए पार्टी को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से अलग बताया है।
सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में सरबरी मुखर्जी ने कहा कि जादवपुर में भाजपा के झंडे के साथ उपद्रव करने वालों की पहचान की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग भाजपा का नाम खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। खास बात यह है कि दो दिन पहले ही विधायक समर्थकों के साथ जादवपुर इलाके में पहुंची थीं और कथित तौर पर हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कड़े तेवर दिखाए थे।
अब विधायक ने सफाई देते हुए कहा है कि वह विश्वविद्यालय परिसर में गई ही नहीं थीं। उनका दावा है कि वह सिर्फ जादवपुर थाने के सामने एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में कुछ भाजपा युवाओं के साथ मौजूद थीं और उसके बाद वहां से चली गईं। उन्होंने ABVP से भी भाजपा का कोई संबंध होने से इनकार किया।
भाजपा के भीतर ही अलग-अलग सुर
जादवपुर हिंसा ने पश्चिम बंगाल भाजपा के भीतर की खींचतान को भी सामने ला दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा कि छात्र आंदोलन को पेशेवर राजनेताओं के हाथों में नहीं जाने देना चाहिए। उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रतीक चिह्न के साथ हुई घटना की भी निंदा की।
वहीं तमलुक से भाजपा सांसद अभिजीत गांगुली ने विश्वविद्यालय के लोगो को नुकसान पहुंचाए जाने को जानबूझकर की गई बेअदबी मानने से इनकार करते हुए इसे दुर्घटना बताया। ऐसे में जादवपुर हिंसा को लेकर भाजपा के नेताओं के बयान एक-दूसरे से मेल खाते नजर नहीं आ रहे हैं।
सत्ता में आने के तीन महीने में ही सवाल
जादवपुर की घटना ऐसे समय हुई है, जब 4 मई को सत्ता में आने के बाद से ही शुभेंदु अधिकारी सरकार को कई मोर्चों पर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। महिलाओं को अन्नपूर्णा योजना के तहत वित्तीय सहायता देने में कथित दिक्कतों को लेकर सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं पर वसूली जैसी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप भी लगातार सामने आ रहे हैं।
ऐसे माहौल में जादवपुर विश्वविद्यालय की हिंसा ने सरकार के सामने कानून-व्यवस्था के साथ-साथ भाजपा संगठन की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस पार्टी ने सत्ता में आने से पहले तृणमूल कांग्रेस के शासन को हिंसा और भय की राजनीति के लिए घेरा था, उसी भाजपा के सामने अब अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं पर लग रहे आरोपों का जवाब देने की चुनौती है।
सरबरी मुखर्जी का अपने ही पहले बयान से पीछे हटना और ABVP से दूरी बनाना इस पूरे विवाद को और गहरा करता है। सवाल यही है कि जादवपुर की सड़कों पर बढ़ते राजनीतिक तनाव पर नियंत्रण कौन करेगा और क्या नई सरकार अपने ही समर्थकों पर लग रहे आरोपों पर प्रभावी कार्रवाई कर पाएगी?
