मुंबई: जनवादी लेखक संघ स्थापना दिवस, लोकतांत्रिक अधिकारों पर मंडराते खतरों पर लेखकों ने किया मंथन  

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Rakesh kumar

जनवादी लेखक संघ के 45वें स्थापना दिवस फरवरी के अंतिम पखवाड़े में फोर्ट, मुंबई में सम्पन्न हुआ।

इस अवसर पर ग़ज़लकार राकेश शर्मा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुंबई मेहनतकशों की नगरी रही है, “गरीबी से भले नफरत करे, गरीबों से नहीं।” उन्होंने कहा कि लेखकों और कवियों को गरीबों के साथ खड़े होकर उनकी मुक्ति के लिए संघर्ष करना चाहिए।

कार्यक्रम में मुंबई के साहित्य-सांस्कृतिक क्षेत्र में जलेस की भूमिका और संगठन की विकास यात्रा पर विस्तृत चर्चा की गई। दूसरे सत्र में बहुभाषी काव्य पाठ का आयोजन हुआ।

केंद्रीय परिषद के सदस्य सुबोध मोरे ने जनवादी लेखक संघ की स्थापना और उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने आपातकाल के बाद के दौर और 80 के दशक में जनवादी अधिकारों पर मंडराते खतरों का जिक्र किया, जब लेखकों और बुद्धिजीवियों के बीच अविश्वास और असंतोष का माहौल था। बांदा और दिल्ली में हुए अधिवेशनों के बाद 14 फरवरी 1982 को जनवादी लेखक संघ की स्थापना की गई।

मुंबई इकाई की भूमिका पर बोलते हुए मुख्तार खान ने कहा कि एक समय जलेस मुंबई देश की सबसे सक्रिय इकाइयों में शुमार थी। संगठन ने महानगर में साहित्यिक और सांस्कृतिक माहौल गढ़ने में अहम भूमिका निभाई और हिंदी, उर्दू व मराठी के कई बड़े लेखकों को साथ जोड़े रखा।

स्थापना दिवस पर दिवंगत लेखकों और बुद्धिजीवियों के योगदान को भी याद किया गया। संजय भिसे ने पूर्व सचिव सूर्यदेव उपाध्याय को याद करते हुए कहा कि उन्हीं की वजह से वे किताबों से जुड़े। दशरथ सिंह, इनायत अख्तर, राधेश्याम उपाध्याय, महमूद अयुबी, डॉ. राम सागर सिंह, साजिद रशीद, प्रो. राम सागर पांडे और सलाम बिन रज़्ज़ाक के योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। वर्तमान वरिष्ठ सदस्यों हृदयेश मयंक, शैलेश सिंह और रमन मिश्र के योगदान की भी सराहना हुई।

काव्य गोष्ठी की शुरुआत कवि गुलज़ार हुसैन ने सांप्रदायिक सोच पर चोट करती कविता ‘सुनो दंगाइयों’ से की। मराठी कवि नारायण सुर्वे की रचना प्रमोद नवार ने पढ़ी, जबकि सुबोध मोरे ने ‘शीक वाला’ और ‘तम्बू टाकला’ का पाठ किया। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष नारायण सुर्वे का जन्मशताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है।

उर्दू शायर फरहान हनीफ ने ‘मौत के फ़रिश्ते’ नज़्म सुनाई। युवा कवि फिरोज़ ने अवसाद पर आधारित अपनी कविताएं, जिनमें ‘और ईश्वर मर जाएगा’ शामिल थी, प्रस्तुत कीं। फिल्मकार अविनाश दास ने समकालीन हालात पर आधारित ग़ज़लें सुनाईं, जिनमें एक शेर था—
“दंगों का सरदार वज़ीर ए आज़म है,
रौनक देखो सब थानों में।”

रीता दास राम ने ‘बंटना नहीं मंज़ूर’ कविता प्रस्तुत की। आगरा इकाई के ज़ाकिर सरदार ने ग़ज़लें सुनाईं,
“जब तक दिल में प्यार नहीं था,
मेरा कोई यार नहीं था…”

पुणे से आईं स्वाति वैद्य ने कोरोना काल पर लिखी अंग्रेज़ी कविता ‘Marginal’ और उसका मराठी अनुवाद पढ़ा। शायर मुस्तहसन अज़्म ने प्रेममय ग़ज़ल पेश की। संजय भिसे ने विद्रोही तेवर की कविता सुनाई। प्रो. हूबनाथ पांडे ने संवाद शैली की लंबी कविता में ‘एक तरफा विकास’ पर टिप्पणी की। राजीव रोहित और वरिष्ठ शायर सैयद रियाज़ रहीम ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।

अंत में राकेश शर्मा ने सियासी और सामाजिक तेवर वाली ग़ज़लें सुनाईं—
“जनतंत्र संविधान सब दहशत में आ गए,
बस्ती के सारे गुंडे सियासत में आ गए…”

कार्यक्रम के समापन पर मुख्तार खान ने सभी का धन्यवाद किया और युवा साहित्यकारों से संगठन से जुड़ने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में उर्दू, हिंदी और मराठी के अनेक रचनाकार उपस्थित रहे, जिनमें अनवर मिर्ज़ा, शादाब रशीद, अल्तमश रशीद, कृष्णा गौतम, रामू जयसवाल, मुकेश रेड्डी और महेश राजपूत शामिल थे।

यह जानकारी जलेस के एक अहम कारकुन मुख्तार खान ने साझा की है।

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