RANCHI
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर जनवादी लेखक संघ (जलेस), रांची की ओर से ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। वरिष्ठ कवि ओम प्रकाश बरनवाल की अध्यक्षता में आयोजित इस आभासी काव्य गोष्ठी का संचालन अपराजिता मिश्रा ने किया। विषय प्रवेश एम. जेड. ख़ान ने कराया, जबकि कुमार बृजेंद्र ने आरंभिक वक्तव्य दिया।
करीब ढाई घंटे तक चली इस काव्य गोष्ठी में देश की वर्तमान स्थिति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक मुद्दों, Gen Z के जंतर-मंतर आंदोलन और देशभक्ति जैसे विषयों पर कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। कविताओं में व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश, गुस्सा और बेचैनी के साथ निराशा के अंधेरे से बाहर निकलने का संकल्प भी दिखाई दिया। धर्म और जाति से ऊपर उठकर एक साथ जीने की आकांक्षा भी रचनाओं में प्रमुखता से उभरी।
हिंदी-उर्दू के साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी हुआ कविता पाठ
गोष्ठी की खास बात यह रही कि हिंदी और उर्दू के अलावा नागपुरी, खोरठा, मुंडारी, हो और कुड़ुख भाषाओं में भी कवियों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाएं सुनाईं। दो दर्जन से अधिक कवि-कवयित्रियों ने कार्यक्रम में भाग लिया।
वरिष्ठ कवि ओम प्रकाश बरनवाल ने देश के भविष्य और शिक्षा की रोशनी को लेकर कविता प्रस्तुत की। कुमार बृजेंद्र की कविता में जंगल और पहाड़ों के बीच हिंसा और शोषण की तस्वीर उभरी। वीना श्रीवास्तव ने राजनीतिक व्यवस्था और वोट की राजनीति पर व्यंग्य करते हुए कविता पढ़ी।
अपराजिता मिश्रा ने अपनी कविता में सत्ता और तानाशाही पर व्यंग्य किया। अली मंजूर बेग की रचना में अन्याय, हिंसा और भय के माहौल को लेकर चिंता दिखाई दी। डॉ. अशरफ अली ने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई एकता पर केंद्रित देशभक्ति की कविता प्रस्तुत की।
उदय हयात की कविता में संघर्ष और अपने हक के लिए लड़ने की भावना सामने आई।
मुंडारी, खोरठा और कुड़ुख में भी गूंजी देशभक्ति
डॉ. सिजेरेन सुरीन ने मुंडारी भाषा में देशभक्ति पर कविता पाठ किया। डॉ. कुमारी कंचन बरनवाल ने खोरठा में कविता प्रस्तुत करते हुए हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई एकता तथा तिरंगे के प्रति सम्मान की भावना को स्वर दिया।
शिव शंकर उरांव ने कुड़ुख भाषा में कविता प्रस्तुत की। उनकी कविता में आदिवासी जीवन के संघर्ष, प्रतिरोध और सामुदायिक अस्मिता की झलक देखने को मिली।
नारदेव करमाली ने साल वृक्षों, हरियाली और पलाश के जरिए झारखंड की प्रकृति और मिट्टी की तस्वीर कविता में उकेरी। शमा परवीन ने ‘जिंदगी एक उधार’ शीर्षक से कविता प्रस्तुत की, जबकि डॉ. नीतू गौरव ने अपने भावपूर्ण पाठ में पीड़ा, वेदना और मायके की स्मृतियों को अभिव्यक्ति दी।
डॉ. उत्तम कुमार की कविता में संप्रभुता और अपने अधिकार की आवाज को प्रमुखता मिली। उन्होंने कहा कि पोस्टर लेकर अपने हक की मांग करने वालों की आवाज भी लोकतंत्र में महत्वपूर्ण है।
देशभक्ति के साथ सामाजिक सरोकार भी रहे केंद्र में
कार्यक्रम में अनीता कुमारी, अविनाश कुमार, रामसेवक रविदास, वीरेन घोष, नेहा कुमारी, डॉ. सिलमानी, ललिता देवगम सहित अन्य कवियों और रचनाकारों ने भी देशभक्ति और सामाजिक सरोकार से जुड़ी कविताएं प्रस्तुत कीं।
गोष्ठी में शामिल रचनाओं में एक ओर देश के प्रति प्रेम और एकता की भावना दिखाई दी, तो दूसरी ओर समाज और व्यवस्था की विसंगतियों पर सवाल भी उठाए गए। कवियों ने अपने-अपने अंदाज में मौजूदा समय की चुनौतियों, युवाओं की बेचैनी और लोकतांत्रिक अधिकारों को अपनी कविताओं का विषय बनाया।
कई शहरों से जुड़े साहित्यकार
इस आभासी काव्य गोष्ठी में रांची के अलावा दिल्ली, जमशेदपुर, हजारीबाग, धनबाद और रामगढ़ के साहित्यकार, कवि और रचनाकर्मी भी ऑनलाइन जुड़े। कार्यक्रम में डॉ. किरण, डॉ. आलम आरा, यास्मीन लाल, विक्की मिंज, सुकेशी कर्मकार, बुधराम बेबोंगा, सत्यनारायण मुंडा, सुधीर साहू, मोईज उद्दीन मिरदाहा, प्रकाश मुंडा, महावीर उरांव, सैयद उजैर अहमद, अब्दुल कय्यूम और सुनीता बरनवाल सहित कई साहित्यकारों की प्रमुख उपस्थिति रही।
