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भारत सरकार के भारी उद्योग मंत्रालय के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एंड्रयू यूल एंड कंपनी लिमिटेड असम में एक बार फिर अपने चाय बागानों में काम करने वाले हजारों मज़दूरों के विरोध का सामना करने जा रही है। कंपनी के चाय बागानों से जुड़े लगभग 35 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मज़दूरों ने आरोप लगाया है कि वर्षों से वेतन, बोनस, चिकित्सा सुविधाओं और अन्य वैधानिक बकाया का भुगतान नहीं किया गया है। लगातार बातचीत और समझौतों के बावजूद समाधान नहीं निकलने पर अब मज़दूरों ने बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है।
मज़दूर संगठनों का कहना है कि पिछले चार वर्षों के दौरान कई दौर की वार्ता, धरना-प्रदर्शन और औपचारिक समझौते हुए, लेकिन कंपनी समयबद्ध तरीके से अपने वादे पूरे करने में विफल रही। इसके कारण हजारों कर्मचारियों को उनके कानूनी अधिकारों और सेवा संबंधी लाभों से वंचित रहना पड़ रहा है। लंबित मामलों में वेतन, बोनस, चिकित्सा सुविधाएं, बकाया भुगतान, तबादले, पदोन्नति और अन्य सेवा लाभ प्रमुख हैं।
इसी मुद्दे पर असम चाय मज़दूर संघ (ACMS) की नाहरकटिया शाखा कार्यालय में आपात बैठक आयोजित की गई। बैठक में गोलाघाट, टिटाबार, नाहरकटिया और मोरन शाखाओं के अध्यक्ष, सचिव, पदाधिकारी और विभिन्न चाय बागानों के मज़दूर प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक की अध्यक्षता नाहरकटिया शाखा के अध्यक्ष अभिराम कुमार ने की, जबकि प्रतिनिधियों का पारंपरिक असमिया गमोसा भेंट कर स्वागत किया गया। स्वागत भाषण शाखा सचिव बालाराम तांती ने दिया।
बैठक में मोरन शाखा के वरिष्ठ सचिव लखेश्वर तांती ने कंपनी प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि शीर्ष प्रबंधन की कथित मज़दूर विरोधी नीतियां, प्रशासनिक विफलता, दूरदर्शिता की कमी और बार-बार दिए गए आश्वासनों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से मज़दूरों का भरोसा टूट चुका है। उनका कहना था कि चार वर्षों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठाने के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला, इसलिए अब मज़दूरों की राय लेकर आगे की रणनीति तय की जा रही है।
गोलाघाट और टिटाबार शाखा के सचिव घनश्याम बसई और नगेन कुर्मी ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कर्मचारियों को अपने वैधानिक अधिकार और बकाया राशि हासिल करने के लिए बार-बार आंदोलन करना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने यूनियनों के साथ हुए समझौतों का पालन नहीं किया और राज्य श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हुए निर्णयों को भी लागू नहीं किया। उनका कहना था कि अब लोकतांत्रिक आंदोलन ही कर्मचारियों के पास बचा अंतिम विकल्प है।
बैठक में मनोज तांती, बोगई भूमिज, रतन मृधा, बिनमु तांती, चामेश्वर कलंदी, मोहन बरहोई और परमेश्वर बारिक सहित कई मज़दूर प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे और आंदोलन को मजबूत करने का आह्वान किया।
