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साल 2000 में जब झारखंड भारत का 28वां राज्य बना, तब लाखों लोगों की नजरें एक ही व्यक्ति पर थीं—शिबू सोरेन। अलग राज्य के आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा, गांव-गांव में “दिशोम गुरु” कहलाने वाला नेता और जल, जंगल, जमीन की लड़ाई का प्रतीक। लेकिन इतिहास का एक दिलचस्प सच है—कई बार जो नेता आंदोलन में सबसे ऊंचा दिखता है, सत्ता में पहुंचने के बाद उसकी परीक्षा और कठिन हो जाती है। शिबू सोरेन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
जिस राज्य का सपना देखा, उसकी पहली सरकार उनके हाथ में नहीं आई
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य बना। स्वाभाविक उम्मीद थी कि इतने लंबे आंदोलन का नेतृत्व करने वाले शिबू सोरेन पहले मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केंद्र की तत्कालीन सरकार ने बाबूलाल मरांडी को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया।
राजनीतिक दृष्टि से यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि झारखंड आंदोलन की उस धारा के लिए बड़ा झटका था, जिसने दशकों तक अलग राज्य की लड़ाई लड़ी थी। कहा जाता है कि उस समय शिबू सोरेन ने सार्वजनिक रूप से कोई बड़ा टकराव नहीं चुना। वे जानते थे कि आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है; उसका अगला चरण राज्य की दिशा तय करना है।
राजनीति ने बदला, लेकिन उनकी भाषा नहीं
दिल्ली की राजनीति में पहुंचने के बाद भी शिबू सोरेन का अंदाज नहीं बदला। वे बड़े-बड़े भाषणों से ज्यादा छोटी और सीधी बात करते थे। संसद में भी उनकी शैली आंदोलनकारी जैसी ही रही। वे अकसर जल, जंगल, जमीन, विस्थापन, खनन और आदिवासी अधिकारों के मुद्दे उठाते थे।
उनके करीबी बताते हैं कि सत्ता के गलियारों में भी वे गांवों की भाषा नहीं भूले। यही कारण थी कि राजधानी दिल्ली में वे केंद्रीय मंत्री हो सकते थे, लेकिन झारखंड के गांवों में लोग उन्हें आज भी “गुरुजी” कहकर ही पुकारते रहे।
आलोचनाएं भी हुईं, लेकिन जनाधार बना रहा
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। उन पर कई गंभीर आरोप लगे, कुछ मामलों में उन्हें अदालतों का सामना भी करना पड़ा। विपक्ष ने इन्हीं मुद्दों पर उन्हें लगातार घेरा। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इन विवादों के बावजूद उनका जनाधार पूरी तरह कभी खत्म नहीं हुआ।
ऐसा क्यों?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण झारखंड का बड़ा हिस्सा उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में देखता था जिसने शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। उनके समर्थकों के लिए उनकी पहचान किसी एक चुनाव या एक मुकदमे से बड़ी थी।
उन्होंने आदिवासी राजनीति की नई परिभाषा दी
झारखंड आंदोलन की शुरुआती राजनीति मुख्यतः आदिवासी अधिकारों के इर्द-गिर्द थी। लेकिन समय के साथ शिबू सोरेन ने यह समझ लिया कि केवल आदिवासी समाज के भरोसे स्थायी राजनीतिक परिवर्तन संभव नहीं होगा।
यही कारण है कि झामुमो ने धीरे-धीरे सदान समुदाय, पिछड़े वर्गों, दलितों और अन्य स्थानीय समूहों को भी अपने राजनीतिक विमर्श में जगह दी। यह बदलाव आसान नहीं था। आलोचना भी हुई कि आंदोलन की मूल भावना कमजोर हो रही है। लेकिन दूसरी ओर, इसी रणनीति ने झामुमो को एक व्यापक क्षेत्रीय दल बनने में मदद की।
सत्ता उनके लिए मंजिल नहीं थी
जो लोग शिबू सोरेन को करीब से जानते थे, वे अक्सर एक बात कहते थे—उन्हें सत्ता की चमक से ज्यादा लोगों के बीच रहना पसंद था। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनका गांवों से रिश्ता नहीं टूटा। वे अक्सर ग्रामीण इलाकों में लोगों से सीधे मिलते, उनकी बातें सुनते और कई बार प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर ही निर्देश देते थे।
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वे खुद को “शासक” से ज्यादा “आंदोलनकारी” मानते रहे।
झारखंड को उन्होंने केवल नक्शे पर नहीं, मानसिकता में भी बनाया
किसी राज्य का निर्माण केवल संसद में कानून पारित होने से नहीं होता। वास्तविक राज्य तब बनता है, जब उसके लोगों में साझा पहचान विकसित होती है। शिबू सोरेन की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही रही कि उन्होंने “झारखंडी” पहचान को मजबूत किया। उन्होंने आदिवासी संस्कृति, लोकभाषाओं, सरना परंपरा, स्थानीय इतिहास और प्राकृतिक संसाधनों के सवाल को मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित किया।
आज झारखंड में चाहे कोई भी राजनीतिक दल हो, जल-जंगल-जमीन, स्थानीयता, विस्थापन और आदिवासी अधिकार जैसे मुद्दों की अनदेखी करना लगभग असंभव है। यह उस वैचारिक विरासत का प्रभाव है, जिसे शिबू सोरेन और उनके समकालीन आंदोलनकारियों ने खड़ा किया।
दिशोम गुरु की सबसे बड़ी विरासत
हर बड़े नेता की विरासत केवल उसकी सरकारों से नहीं मापी जाती। महात्मा गांधी को केवल प्रधानमंत्री न बनने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन से याद किया जाता है। जयप्रकाश नारायण को सत्ता से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आंदोलन से पहचाना जाता है। उसी तरह शिबू सोरेन की सबसे बड़ी पहचान मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि उस जननेता के रूप में रहेगी जिसने झारखंड के लाखों लोगों को यह विश्वास दिलाया कि उनकी भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी जमीन भी भारतीय लोकतंत्र में बराबर महत्व रखती है। उन्होंने एक ऐसे समाज को आवाज दी, जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया था।
नई पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा सवाल
आज, जब झारखंड 25 वर्ष पूरे कर चुका है, नई पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि शिबू सोरेन कितनी बार मुख्यमंत्री बने। असल प्रश्न यह है कि क्या जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, सम्मान और सामाजिक न्याय का वह सपना पूरा हुआ, जिसके लिए हजारों लोगों ने संघर्ष किया था? शायद इस सवाल का जवाब तलाशना ही दिशोम गुरु शिबू सोरेन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
समापन
शिबू सोरेन का जीवन विरोधाभासों से भरा रहा—वे आंदोलनकारी भी थे और मुख्यमंत्री भी; जननेता भी थे और सत्ता का हिस्सा भी; उनकी प्रशंसा भी हुई और आलोचना भी।
लेकिन इन सबके बीच एक तथ्य निर्विवाद है—यदि झारखंड आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें दिशोम गुरु शिबू सोरेन का अध्याय सबसे लंबा, सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक चर्चित अध्यायों में शामिल होगा।
