Guwahati
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक 38 वर्षीय निवासी की याचिका खारिज करते हुए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें उसे विदेशी घोषित किया गया था। अदालत ने कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए पेश किए गए 15 दस्तावेज़ कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतर सके।
जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने कहा कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा-9 के तहत नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी स्वयं याचिकाकर्ता पर थी, लेकिन वह इस कानूनी दायित्व को पूरा नहीं कर पाया।
दस्तावेज़ों में मिले कई विरोधाभास
याचिकाकर्ता ने 1951 के एनआरसी के कम्प्यूटरीकृत रिकॉर्ड, पुराने भूमि दस्तावेज़ और विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियां अदालत के समक्ष प्रस्तुत की थीं। हालांकि, जांच में उसके दादा के नाम की चार अलग-अलग स्पेलिंग सामने आईं, जिससे दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए।
अदालत ने यह भी पाया कि परिवार के कथित पुश्तैनी इतिहास और तीन अलग-अलग गांवों के बीच कोई स्पष्ट एवं सत्यापित संबंध स्थापित नहीं हो सका।
स्कूल प्रमाणपत्र और वोटर आईडी भी नहीं बने आधार
कोर्ट ने स्कूल सर्टिफिकेट, पैन कार्ड और वोटर आईडी जैसे अन्य दस्तावेज़ों को भी पर्याप्त साक्ष्य मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध पारिवारिक और पुश्तैनी रिकॉर्ड के अभाव में ऐसे दस्तावेज़ अकेले भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं बन सकते।
मौखिक गवाही को नहीं मिली कानूनी मान्यता
मामले में याचिकाकर्ता के पिता की मौखिक गवाही भी पेश की गई थी, लेकिन अदालत ने कहा कि दस्तावेज़ों में मौजूद गंभीर विसंगतियों को केवल मौखिक बयान के आधार पर दूर नहीं किया जा सकता। इस फैसले के साथ हाई कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
