चाय बागानों की जमीन पर सियासी तूफान: खेती की ज़मीन कंपनी को आवंटित, काज़ीरंगा में जांच की मांग

CENTRAL DESK

असम, काज़ीरंगा नेशनल पार्क के आसपास दशकों से खेती कर रहे चाय बागान मजदूरों और आदिवासी परिवारों की जमीन एक निजी हॉस्पिटैलिटी कंपनी को सौंपे जाने के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। असम चाय मज़दूर संघ (ACMS) ने आरोप लगाया है कि इनले पाथर और हाथीखुली क्षेत्र की उपजाऊ कृषि भूमि का वर्गीकरण बदलकर उसे निजी हाथों में सौंप दिया गया, जबकि पीढ़ियों से इस जमीन पर निर्भर परिवारों से न तो राय ली गई और न ही उनकी आजीविका की चिंता की गई। संगठन ने पूरे मामले की उच्च-स्तरीय जांच की मांग की है।

ACMS ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाने के लिए रंगाजन चाय बागान की गीता गोवाला की सराहना की है। वहीं सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार भी मामले को गंभीरता से ले रही है और जल्द कोई पहल किए जाने की संभावना है।

पानीटोला के पूर्व विधायक और ACMS शाखा सचिव राजू साहू ने सवाल उठाया कि पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील काज़ीरंगा क्षेत्र में किसी बड़े प्रोजेक्ट के प्रभाव का समुचित आकलन किए बिना भूमि का वर्गीकरण कैसे बदला गया और उसे निजी कंपनी को कैसे आवंटित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने वर्षों तक जमीन को उपजाऊ बनाया और जिनकी रोजी-रोटी इसी पर निर्भर है, उनकी अनदेखी कर लिया गया फैसला कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

साहू ने तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए भूमि आवंटन प्रक्रिया की उच्च-स्तरीय जांच कराने की मांग की। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि निजी कंपनियों को जमीन सौंपने के बजाय उन आदिवासी चाय जनजाति परिवारों और अन्य स्थानीय निवासियों को भूमि पट्टे दिए जाएं जो दशकों से वहां रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं।

ACMS का दावा है कि इनले पाथर और हाथीखुली के अनेक परिवार पीढ़ियों से इस भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। संगठन के अनुसार लोगों से कोई परामर्श किए बिना भूमि की श्रेणी बदली गई और बाद में उसे एक हॉस्पिटैलिटी कंपनी को आवंटित कर दिया गया। संघ का कहना है कि इससे स्थानीय लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

संगठन ने उन खबरों पर भी स्पष्टीकरण मांगा है जिनमें कहा गया था कि गीता गोवाला को मुख्यमंत्री राहत कोष से तीन लाख रुपये की सहायता दी जानी थी। ACMS ने पूछा है कि यह प्रस्ताव किन परिस्थितियों में और किस उद्देश्य से दिया गया था।

राजू साहू ने बताया कि आदिवासी चाय मज़दूर कांग्रेस और कई अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने हाल ही में विवादित स्थल का दौरा कर वास्तविक स्थिति का जायजा लिया। उनके अनुसार स्थानीय लोग भूमि आवंटन का लगातार विरोध कर रहे हैं, जबकि वे नियमित रूप से जमीन का लगान भी भरते रहे हैं।

उन्होंने दावा किया कि कई परिवारों के पास रैयती रिकॉर्ड और पीरियॉडिक पट्टे मौजूद हैं, जो उनके लंबे समय से भूमि पर अधिकार और कब्जे को साबित करते हैं। ऐसे परिवारों ने किसी भी बेदखली प्रयास का विरोध करने का संकल्प लिया है।

साहू ने कहा कि इस विवाद के शुरुआती चरण में असम चाय जनजाति छात्र संघ (ATTSA) के तत्कालीन नेताओं, जिनमें धीरज गोवाला भी शामिल थे, ने सरकार से बातचीत की थी। हालांकि मांगें पूरी नहीं होने पर वे वार्ता प्रक्रिया से अलग हो गए थे।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस मुद्दे को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान ATTSA के वर्तमान अध्यक्ष जगदीश बोराईक को पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। ACMS का कहना है कि जब तक पूरे भूमि आवंटन मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होती और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा नहीं की जाती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

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