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बराक घाटी में आदिवासी और स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर लगातार कमजोर होते प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। इसी मुद्दे को उठाते हुए क्षेत्र के सांसद ने केंद्र सरकार से सिलचर दूरदर्शन केंद्र (डीडीके) को फिर से पूरी क्षमता के साथ शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल एक प्रसारण केंद्र नहीं, बल्कि बराक घाटी की आदिवासी और बहुभाषी सांस्कृतिक आवाज़ को देश तक पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम रहा है, जिसे अब फिर से मजबूत करने की जरूरत है।
आदिवासी संस्कृति के लिए खोता हुआ मंच
बराक घाटी के बोडो, दिमासा, रेंगमा, हमार और अन्य आदिवासी समुदायों की लोकपरंपराएं, भाषाएं और सांस्कृतिक धरोहर लंबे समय से राष्ट्रीय मीडिया में सीमित स्थान पा रही हैं। सांसद का कहना है कि सिलचर डीडी केंद्र के सक्रिय रहने पर इन समुदायों की लोककथाएं, नृत्य, संगीत और पारंपरिक ज्ञान नियमित रूप से प्रसारित होकर व्यापक पहचान बना सकते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि मौजूदा मीडिया ढांचे में आदिवासी सामग्री की कमी उनकी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर कर रही है, जिसे सार्वजनिक प्रसारण सेवा ही संतुलित कर सकती है।
प्रतिनिधित्व और विकास के बीच बढ़ता अंतर
स्थानीय संगठनों का कहना है कि जब बराक घाटी विकास और नीतिगत चर्चाओं का हिस्सा बन रही है, तब उसकी सांस्कृतिक और आदिवासी आवाज़ को भी समान महत्व मिलना चाहिए। सिलचर दूरदर्शन केंद्र का पुनर्जीवन न केवल मीडिया प्रतिनिधित्व को मजबूत करेगा, बल्कि यह आदिवासी युवाओं को अपनी भाषा और विरासत से जोड़ने का एक बड़ा माध्यम भी बनेगा। सांसद ने केंद्र से आग्रह किया है कि तकनीकी उन्नयन, स्थानीय कार्यक्रम निर्माण और स्थायी स्टाफ व्यवस्था के जरिए इस केंद्र को फिर से जीवंत किया जाए, ताकि बराक घाटी की आदिवासी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उभर सके।
