पीयूष प्रियांक
सिकन्दर लौट रहा है
उन्माद और लूट के साथ
उसकी सेना लालच और जीत में अंधी हो रही है
सिकंदर थक चुका है
वो जान चुका है जीत झूठी है,
पहले से ज़्यादा खोखला और
अकेला महसूस कर रहा है
पर सेना उसे मार देगी
उसे सच नहीं बोलना इसीलिए
वो विजेता का अभिनय कर रहा है
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तू कहे तो मैं सुंदर
तू कहे तो मैं ईश्वर
तू कहे तो मैं प्यारा
जब तू कहे तब
मैं ऐसा मैं वैसा
ऐसा मेरा प्यार
अंदर से ख़ाली बाहर से विज्ञापन.
(कवि का परिचय- झारखंड के फुसरो (बोकारी) शहर से निकलकर मुंबई तक का पीयूष प्रियांक का सफर कहानियों के प्रति जुनून की कहानी है। कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट नौकरी की बजाय फिल्म निर्माण का रास्ता चुना और मुंबई जाकर लेखन व निर्देशन में अपनी पहचान बनाई है)
