“अल्पसंख्यक” कहें या “मुसलमान”, राहुल गांधी के बयान के क्या हैं मायने

TANWEER AHMED

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अल्पसंख्यक विभाग की सलाहकार परिषद की बैठक में मुस्लिम नेताओं से जो बात कही, वह आज के दौर की एक कड़वी लेकिन सच्ची हकीकत है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर किसी मुसलमान के साथ अन्याय होता है, तो केवल “अल्पसंख्यक” शब्द के पीछे छिपने के बजाय एक “मुसलमान” के तौर पर खुलकर आवाज उठानी चाहिए। उनका यह  बयान उन नेताओं के लिए आईना है जो मुस्लिम समाज के वोट और समर्थन से राजनीति में ऊंचे मुकाम तक पहुंचते हैं, लेकिन वक्त आने पर समाज के दर्द और परेशानियों पर खामोश हो जाते हैं।

आज देश में मुस्लिम समाज कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। कहीं मजहब के नाम पर नफरत फैलायी जा रही है, कहीं मॉब लिंचिंग की घटनाएं होती हैं, कहीं बुलडोज़र कार्रवाई के नाम पर गरीबों के घर उजाड़ दिए जाते हैं, तो कहीं बेगुनाह नौजवानों को झूठे मामलों में फंसाने के आरोप लगते हैं। कई बार त्योहारों, इबादतगाहों और धार्मिक पहचान को लेकर भी तनाव पैदा किया जाता है। पुलिसया जुल्म का सबसे ज़्यदा मुस्लिम समाज ही शिकार रहा है, शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं में भी मुस्लिम समाज खुद को लगातार पीछे और उपेक्षित महसूस करता है।

लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिन मुस्लिम नेताओं को समाज अपनी उम्मीद समझता है, उनमें से बड़ी संख्या खुलकर बोलने से बचती है। जैसे ही कोई बड़ा पद, मंत्रालय या संगठन में जिम्मेदारी मिलती है, कई लोग अपने समाज की बात करने में हिचकिचाने लगते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उन पर “सिर्फ मुस्लिम नेता” होने का ठप्पा न लग जाए। सेक्युलर दिखने की होड़ में वे अपने ही समाज की तकलीफों पर चुप्पी साध लेते हैं।

सेक्युलरिज्म का मतलब अपनी पहचान और अपने समाज के दर्द को भूल जाना नहीं होता। असली सेक्युलर वही है जो हर मजलूम, हर पीड़ित और हर कमजोर इंसान के लिए आवाज उठाए, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या वर्ग से हो। अगर दलितों पर अन्याय हो तो दलितों के हक में आवाज उठनी चाहिए, अगर आदिवासियों पर जुल्म हो तो उनके साथ खड़ा होना चाहिए, और अगर मुसलमानों के साथ भेदभाव या नाइंसाफी हो रही है तो उस पर भी खुलकर बोलना चाहिए।

सच तो यह है कि कई मौकों पर मुस्लिम समाज के मुद्दों को बहुसंख्यक समाज के इंसाफ पसंद और सेक्युलर लोगों ने ज्यादा मजबूती से उठाया है। लेकिन किसी भी कौम की लड़ाई तब और मजबूत होती है जब उसके अपने प्रतिनिधि भी बेखौफ होकर उसके साथ खड़े हों। राजनीति सिर्फ कुर्सी और सत्ता तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन लोगों की आवाज बनने का जरिया होनी चाहिए जिनकी बदौलत नेता उस मुकाम तक पहुंचते हैं।

आज जरूरत ऐसे नेताओं की है जो सिर्फ चुनाव के वक्त मुस्लिम मोहल्लों में नजर न आएं, बल्कि हर उस मौके पर खड़े हों जहां समाज के साथ नाइंसाफी हो रही हो। जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखें, जो डर और दबाव से ऊपर उठकर सच बोल सकें, और जो अपने समाज को सिर्फ वोट बैंक नहीं बल्कि बराबरी के हकदार नागरिक समझें।

राहुल गांधी की यह बात इसलिए अहम है क्योंकि उन्होंने पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि पहचान के साथ इंसाफ की बात की है। किसी भी समुदाय के जख्म को सिर्फ “अल्पसंख्यक” या “वर्ग” कहकर नहीं समझा जा सकता, उसके दर्द को उसी पहचान के साथ स्वीकार करना और उसके लिए आवाज उठाना ही असली लोकतंत्र और इंसाफ की निशानी है।

(लेखक का परिचय: तनवीर अहमद, प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम ने एक बड़ी लकीर खींची है। वे रांची में रहते हैं)

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