Ranchi/New Delhi | Special Report
मानवता को शर्मसार करने वाली घटना
राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके कोहाट एन्क्लेव से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया है। झारखंड के खूंटी जिले के अड़की इलाके की एक आदिवासी युवती को दिल्ली की एक आलीशान कोठी में पिछले 17 वर्षों से बंधुआ मजदूर बनाकर रखा गया था। 32 वर्षीय पीड़िता ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि उसे न केवल शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गई, बल्कि उसके साथ बार-बार दुष्कर्म जैसी घिनौनी वारदातों को अंजाम दिया गया।
लालच, धोखा और 17 साल का काला वनवास
घटना की शुरुआत तब हुई जब पीड़िता मात्र 15 वर्ष की थी। उसके पड़ोसी गांव के एक दलाल (जेटा मुंडा) ने उसे शहर में अच्छी नौकरी और बेहतर जीवन का झांसा दिया। दिल्ली लाने के बाद उसे कोहाट एन्क्लेव के एक बड़े कारोबारी के घर ‘घरेलू काम’ के लिए छोड़ दिया गया। बाहर की दुनिया से उसका संपर्क काटने के लिए कारोबारी के परिवार ने उसके पास मौजूद सभी मोबाइल नंबर और संपर्क के कागजात जला दिए। इन 17 वर्षों के दौरान पीड़िता के पिता की मृत्यु हो गई, लेकिन उसे अंतिम विदा देने के लिए घर जाने की अनुमति तक नहीं मिली। विरोध करने पर उसे स्टोर रूम में बंद कर दिया जाता और बेरहमी से पीटा जाता था।
हैवानियत की पराकाष्ठा: दुष्कर्म और जबरन गर्भपात
पीड़िता के अनुसार, प्रताड़ना का सिलसिला यहीं नहीं रुका। कारोबारी की बेटी की शादी के दौरान आए एक हलवाई ने चाकू की नोक पर उसके साथ दुष्कर्म किया। जब वह गर्भवती हुई, तो कारोबारी की बहू और बेटी ने मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर उसका जबरन गर्भपात करा दिया। इसके बाद कोठी के पास काम करने वाले एक अन्य नौकर ने भी उसके साथ दुष्कर्म किया। सीसीटीवी फुटेज में इन वारदातों के सबूत होने के बावजूद, पुलिस को सूचना देने के बजाय मामले को रफा-दफा कर दिया गया और पीड़िता को मुंह बंद रखने की धमकी दी गई।
सिंडिकेट का खेल: झारखंड की बेटियों का सौदा
एक रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के 250 से अधिक दलाल हर साल करीब 18 हजार लड़कियों को महानगरों में बेच देते हैं। दिल्ली की लगभग 240 प्लेसमेंट एजेंसियां सीआईडी की जांच के दायरे में हैं। ये दलाल गरीब माता-पिता को 10-20 हजार रुपये एडवांस देकर बेटियों को ले जाते हैं और फिर उन्हें दिल्ली जैसी जगहों पर 2 से 2.5 लाख रुपये में बेच दिया जाता है।
एनजीओ की मदद से मिली ‘नई जिंदगी’
पिछले साल नवंबर में पीड़िता के भाई-बहन एक एनजीओ की मदद से उस कोठी तक पहुंचने में सफल रहे। शुरुआत में कारोबारी ने उन्हें महज 15 हजार रुपये देकर भगा दिया। लेकिन परिजनों ने हिम्मत नहीं हारी और 9 अप्रैल को दोबारा वहां पहुंचकर दबाव बनाया। अंततः कारोबारी ने पकड़े जाने के डर से पीड़िता को मुक्त किया और 17 साल की मजदूरी के बदले 1.70 लाख रुपये थमा दिए। मुक्त होने के बाद पीड़िता ने सुभाष प्लेस थाने में मामला दर्ज कराया है, जिसके बाद पुलिस जांच में जुट गई है।
