EBRAR AHMED
आज उर्दू अदब की महफ़िल सूनी है और रांची की फिजाओं में एक अजीब सी उदासी का डेरा है। इल्म-ओ-दानिश के अज़ीम पैकर और उर्दू लिसानियात के मोतबर सुतून, प्रो. डॉ. अहमद सज्जाद साहब अब हमारे दरमियान नहीं रहे। उनका विसाल महज एक उस्ताद का बिछड़ना नहीं, बल्कि एक तहजीब और एक पूरे अहद का रुखसत हो जाना है।
डॉ. सज्जाद साहब ने अपनी पूरी जिंदगी इल्म की तल्खियों को मिठास में बदलने और नस्लों को संवारने में गुजार दी। रांची विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष के तौर पर उनकी खिदमत को हमेशा सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। वह सिर्फ एक ‘मुदर्रिस’ नहीं थे, बल्कि अपने शागिर्दों के लिए एक रहनुमा और शफीक साया थे। उनके लहजे में वह शीरीनी थी जो सुनने वाले के दिल में उतर जाती थी।
अदब के साथ-साथ समाजी सतह पर भी उनकी शख्सियत किसी मशाअल से कम न थी। झारखंड सद्भावना मंच के जरिए उन्होंने समाज में रवादारी, इत्तेहाद और भाईचारे की जो शमा जलाई, वह उनकी इंसान-दोस्ती का सबसे बड़ा सुबूत है। वह सादा-मिजाजी और खुलूस का ऐसा संगम थे, जिसकी मिसाल आज के दौर में कम ही मिलती है।
एक ऐसी कमी जो कभी पुर न होगी
उनका इंतकाल उर्दू अदब के लिए एक ऐसा ‘खला’ पैदा कर गया है, जिसे पुर करना नामुमकिन है। उनकी तहरीरें और उनके खयालात आने वाली नस्लों के लिए हमेशा चिराग-ए-राह बने रहेंगे।
“बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा…”
आज हम एक ऐसे ही दीदा-वर को नम आंखों से रुखसत कर रहे हैं। खुदा-ए-बुजुर्ग-ओ-बरतर उन्हें जवार-ए-रहमत में आला मुकाम अता फरमाए और उनके तमाम चाहने वालों को यह सदमा बर्दाश्त करने का हौसला दे।
अलविदा, “तुम जा रहे हो छोड़ के दुनिया-ए-रंग-ओ-बू,
अब ढूँढेगा कहाँ हमें तुम सा सुख़न-शनास (पारखी)?” –
लेखक का परिचय – सदस्य, वक़्फ़ बोर्ड एवं संयोजक, माही।
