मालदा में 9 घंटे तक घेराव, पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल, कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान
NEW DELHI
पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने इसे सुनियोजित साजिश करार देते हुए कहा कि यह विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को समय पर पूरा होने से रोकने का प्रयास है।
मामला पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के कालियाचक क्षेत्र का है, जहां सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं, को बुधवार दोपहर से भीड़ ने घेर लिया। यह घेराव करीब नौ घंटे तक चला। आखिरकार देर रात करीब 1 बजे पुलिस और अर्धसैनिक बलों की मदद से सभी अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- राज्य की निष्क्रियता बेहद निंदनीय
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की निष्क्रियता “बेहद निंदनीय” है।
साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अफसरों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि संबंधित स्थानीय अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है।
चुनाव आयोग ने कहा- ‘जंगलराज’ जैसी स्थिति
चुनाव आयोग ने भी इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। आयोग ने कहा कि किसी ने नहीं सोचा था कि न्यायिक अधिकारियों को इस तरह बंधक बनाया जाएगा। आयोग ने राज्य की स्थिति को “जंगलराज” करार दिया।
कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह केंद्रीय बलों की मांग कर उन्हें तैनात करे, ताकि SIR प्रक्रिया में लगे न्यायिक अधिकारियों और सरकारी कार्यालयों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
परिवारों की सुरक्षा और जांच के संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों के परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
रिपोर्ट के मुताबिक, विरोध करने वाली भीड़ में वे लोग शामिल थे जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि इस पूरे मामले की जांच CBI या किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जा सकती है। इस पर विस्तृत आदेश दिन में जारी किया जाएगा।
CJI बोले- ऐसा ध्रुवीकरण पहले नहीं देखा
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में इतना राजनीतिक ध्रुवीकरण पहले कभी नहीं देखा। उन्होंने बताया कि वे देर रात 2 बजे तक इस मामले पर नजर बनाए हुए थे और लगातार अपडेट ले रहे थे। वहीं राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से अनुरोध किया कि आदेश से “संवैधानिक तंत्र के पूर्ण विघटन” जैसे शब्द हटाए जाएं। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
