NEW DELHI
मिडिल ईस्ट में युद्ध का संकट थमने और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के फिर से पुराने स्तर पर लौट आने के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई कटौती नहीं की गई है। इससे आम लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में राहत मिल रही है तो घरेलू उपभोक्ताओं को इसका फायदा क्यों नहीं दिया जा रहा।
दरअसल, ब्रेंट क्रूड की कीमतें हाल के दिनों में गिरकर 71 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर के करीब है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी दावा किया था कि युद्ध समाप्त होते ही तेल बाजार तेजी से सामान्य हो जाएगा और फिलहाल यह अनुमान सही साबित होता दिख रहा है।
अगस्त तक के लिए पहले ही खरीद चुका है भारत
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने जुलाई और अगस्त के पहले पखवाड़े तक के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चे तेल की खरीद पहले ही कर ली है। भारतीय रिफाइनरियां आमतौर पर दो से तीन महीने पहले अपनी खरीद योजना तय कर लेती हैं, इसलिए मौजूदा सस्ती दरों का तत्काल असर घरेलू ईंधन कीमतों पर नहीं दिख रहा है।
भारत इस समय रूस, अमेरिका, नाइजीरिया, वेनेजुएला और ब्राजील समेत कई देशों से बड़े पैमाने पर तेल आयात कर रहा है। जून में देश के कुल आयात का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रूस से आने का अनुमान है। प्रतिदिन 23 से 24 लाख बैरल रूसी तेल की खरीद जारी है, जो अब भी भारत के लिए सबसे किफायती विकल्प बना हुआ है।
ईरानी तेल पर अब भी अनिश्चितता
हालांकि अमेरिका ने ईरानी तेल पर 60 दिनों के लिए प्रतिबंधों में ढील दी है और ईरान भारत को फिर से अपना बड़ा ग्राहक बनाना चाहता है, लेकिन भारत फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिकी नीति स्थायी रूप से स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक भारतीय कंपनियां ईरानी तेल के साथ बड़े समझौते करने से बचेंगी।
टैक्स और पुरानी लागत भी बड़ी वजह
विश्लेषकों का कहना है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। केंद्र और राज्यों के कर, परिवहन लागत, रिफाइनिंग खर्च और पहले से खरीदे गए महंगे स्टॉक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार में तत्काल गिरावट का असर उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लगता है।
चीन की घटती मांग से भी मिली राहत
वैश्विक बाजार में चीन की घटती तेल खपत ने भी कीमतों को नीचे लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उपयोग और औद्योगिक गतिविधियों में सुस्ती के कारण चीन की मांग में उल्लेखनीय कमी आई है। इससे दुनिया भर में तेल की उपलब्धता बढ़ी और कीमतों पर दबाव कम हुआ।
फिलहाल स्थिरता को प्राथमिकता
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस समय कीमतों में तात्कालिक कटौती के बजाय आपूर्ति की स्थिरता और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। सरकार और तेल कंपनियां पहले यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि वैश्विक हालात वास्तव में स्थिर हो गए हैं और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट टिकाऊ है।
यही वजह है कि मिडिल ईस्ट संकट खत्म होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को अभी पेट्रोल और डीजल के दामों में राहत का इंतजार करना पड़ रहा है।
