Central Desk
जब से कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया अकाउंट सरकार ने बैन किया (हालांकि कुछ दिन बाद इस बैन को हटा लिया गया), तभी से सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार की आलोचना करने वाली आवाजों को लेकर मोदी सरकार की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने सरकार या उसकी एजेंसियों की ओर से मिले निर्देशों का हवाला देते हुए पोस्ट, अकाउंट और चैनल को भारत में ब्लॉक किया है। सवाल अब सिर्फ किसी एक पोस्ट को हटाने का नहीं है, बल्कि यह है कि सरकारी आदेश के जरिए सोशल मीडिया पर राजनीतिक आलोचना की सीमा कौन तय कर रहा है।
कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने के सरकारी आदेशों का पैमाना भी तेजी से बढ़ा है। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, MeitY की ओर से ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉक करने के आदेश 2024 में करीब 12,600 से बढ़कर 2025 में लगभग 24,300 हो गए। रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया कि इन आदेशों में बड़ी संख्या Instagram, Facebook और YouTube पर राजनीतिक दलों और नेताओं के पोस्ट के URL हटाने से जुड़ी थी।
सवाल यह नहीं कि कंटेंट हटाया गया, सवाल यह है कि किसका और क्यों?
सरकार के पास गैरकानूनी सामग्री, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य निर्धारित परिस्थितियों में ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने का कानूनी अधिकार है। IT Act की धारा 69A के तहत सरकार ऐसे आदेश जारी कर सकती है। 2026 में सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों के लिए अदालत या सरकार की ओर से दिए गए वैध निर्देश के बाद गैरकानूनी कंटेंट हटाने की समयसीमा भी तीन घंटे कर दी है।
लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब इसी अधिकार का इस्तेमाल राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य या सरकार के खिलाफ उठ रही आवाजों वाले कंटेंट के मामले में होने लगे।
Human Rights Watch ने भी 2026 में भारत में ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉकिंग के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार की ओर से ऐसे पोस्ट ब्लॉक करने के निर्देश दिए गए हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार की आलोचना से जुड़े थे। संस्था ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर भी सवाल उठाए हैं।
X के सामने सरकार का आदेश, अकाउंट ब्लॉक करने को कहा
मार्च 2026 में यह मामला तब सामने आया जब MeitY ने X को 12 अकाउंट ब्लॉक करने का निर्देश दिया। इस निर्देश को लेकर X ने सरकार से कहा कि किसी पूरे अकाउंट को ब्लॉक करना उसके संचालक के अधिकारों पर “अत्यधिक और असंगत” असर डाल सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक, MeitY ने 18 मार्च को X को इन अकाउंट्स को आदेश मिलने के एक घंटे के भीतर ब्लॉक करने को कहा था। यानी अब कार्रवाई केवल किसी एक विवादित पोस्ट तक सीमित नहीं रह गई है। कुछ मामलों में पूरे अकाउंट को ही भारत में रोकने का आदेश दिया जा रहा है।
4PM चैनल ब्लॉक होने का मामला भी अदालत पहुंचा
मार्च 2026 में YouTube चैनल ‘4PM’ को ब्लॉक किए जाने का मामला भी दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत में दाखिल याचिका के मुताबिक, YouTube ने चैनल संचालकों को बताया था कि उसे MeitY की ओर से चैनल ब्लॉक करने का निर्देश मिला है। YouTube ने इस कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा सरकारी निर्देश बताया था। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह साफ होता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल अपनी आंतरिक नीतियों के आधार पर ही कंटेंट नहीं हटा रहे, बल्कि सरकारी निर्देश भी उनकी कार्रवाई का आधार बन रहे हैं।
सरकार कहती है- कानून का पालन जरूरी, आलोचकों को सेंसरशिप की चिंता
सरकार का पक्ष है कि सोशल मीडिया कंपनियां भारत में कारोबार करती हैं तो उन्हें भारतीय कानूनों का पालन करना होगा। सरकार ने बार-बार कहा है कि गलत सूचना, हिंसा भड़काने वाली सामग्री, साइबर अपराध और अन्य गैरकानूनी कंटेंट पर तेजी से कार्रवाई जरूरी है। लेकिन आलोचना इस बात को लेकर है कि कानून के नाम पर सरकार की आलोचना और गैरकानूनी कंटेंट के बीच अंतर कौन तय करेगा।
अगर किसी पोस्ट में हिंसा, अपराध या स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित सामग्री है तो उस पर कार्रवाई का आधार समझ में आता है। लेकिन अगर किसी पोस्ट का अपराध सिर्फ इतना है कि उसमें सरकार, प्रधानमंत्री या किसी सरकारी नीति की आलोचना की गई है, तो सवाल अलग हो जाता है।
मोदी की पोस्ट हटने पर सरकार ने Meta को किया तलब
दिलचस्प यह है कि हाल में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक Facebook पोस्ट कुछ समय के लिए प्रतिबंधित हुई तो केंद्र सरकार ने Meta के अधिकारियों को तलब कर जवाब मांगा। Meta ने इसे तकनीकी गलती बताया और बाद में पोस्ट बहाल कर दी गई। इस घटना ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा किया—अगर सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से कंटेंट हटाने को लेकर जवाब मांग सकती है, तो क्या यूजर्स और नागरिकों को भी यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उनकी पोस्ट या अकाउंट किस सरकारी आदेश के तहत ब्लॉक किया गया?
सरकारी आदेश कितने हैं, यह भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं
X की अपनी Transparency Center रिपोर्ट बताती है कि उसके आंकड़ों में सरकारी संस्थाओं के साथ अदालतों और अन्य औपचारिक कानूनी मांगों को भी शामिल किया जाता है। कंपनी यह भी स्पष्ट करती है कि किसी मांग के जवाब में अकाउंट या पोस्ट को रोका जा सकता है या अकाउंट पर दूसरी कार्रवाई हो सकती है। यही वजह है कि केवल “इतनी पोस्ट हटाई गईं” का आंकड़ा पूरी कहानी नहीं बताता। यह भी पता होना चाहिए कि कितने आदेश सरकार ने दिए, कितने अदालतों ने, कितने मामलों में पूरी तरह अकाउंट ब्लॉक किया गया और कितने मामलों में सिर्फ एक पोस्ट या URL हटाया गया।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल- आलोचना की सीमा कौन तय करेगा?
भारत जैसे लोकतंत्र में सरकार के पास कानून लागू करने और गैरकानूनी कंटेंट रोकने की जिम्मेदारी है। लेकिन सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, राजनीतिक आलोचना करना, व्यंग्य करना और विरोध दर्ज कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
ऐसे में अगर सरकारी आदेशों के जरिए लगातार सोशल मीडिया पोस्ट और अकाउंट ब्लॉक किए जाते हैं, तो सरकार से यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि इन आदेशों का आधार क्या है और क्या इनके जरिए सरकार विरोधी आवाजों को दबाने की कोई गुंजाइश पैदा हो रही है?
क्योंकि सोशल मीडिया आज सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह राजनीतिक बहस, पत्रकारिता, विरोध और जनता की आवाज का एक बड़ा मंच बन चुका है। और इसी वजह से अब बहस सिर्फ यह नहीं रह गई है कि कौन-सी पोस्ट हटाई गई। असली सवाल यह है कि पोस्ट हटाने का आदेश किसने दिया, किस आधार पर दिया और उस आदेश की स्वतंत्र समीक्षा की व्यवस्था क्या है। इसी बीच सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जा रहा है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में औसतन हर कुछ मिनट में एक पोस्ट हटाने या ब्लॉक करने की कार्रवाई हुई है। हालांकि इस दावे को आधिकारिक आंकड़े के रूप में पेश करने के लिए पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
