Cinema Desk
दिल्ली में टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर (TCOTF) का मार्च चैप्टर एक साधारण स्क्रीनिंग से कहीं आगे का अनुभव बनकर सामने आया, जहाँ एक फिल्म ने न सिर्फ दर्शकों को प्रभावित किया, बल्कि संवाद, जिज्ञासा और नए विचारों के कई दरवाज़े खोले। कोलकाता से आए फिल्मकारMithunPramanikकी फिल्मThe Scientist Who Runs at Nightके ज़रिए सिनेमा, समाज और समर्पण पर एक गहरी और ज़रूरी बातचीत देखने को मिली – जो धीरे-धीरे एक मजबूत फिल्म कम्युनिटी में बदलती इस पहल की पहचान बन रही है।
सिनेमा से शुरू होकर लोगों तक पहुँचती बातचीत
दिल्ली में Sri Aurobindo Centre for Arts and Communication के हार्मोनी हाउस ऑडिटोरियम में जब Talk Cinema On The Floor (TCOTF)का मार्च चैप्टर शुरू हुआ, तो माहौल किसी औपचारिक आयोजन जैसा कम और एक खुले, साझा स्पेस जैसा ज़्यादा लगा। शुरुआत परिचयों से हुई – लेकिन यह सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। हर व्यक्ति अपने साथ सिनेमा से जुड़ा एक अनुभव लेकर आया था, और धीरे-धीरे बातचीत का एक सिलसिला बनता गया – सहज, आत्मीय और विचारों से भरा।
एक प्लेटफॉर्म, जो आकार ले रहा है
एनडीएफएफ के संस्थापक आशीष के सिंह ने बातचीत की शुरुआत करते हुए बताया कि यह TCOTF काआठवां चैप्टरहै। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही – कि यह मंच अब सिर्फ फिल्मों पर चर्चा करने की जगह नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा स्पेस बन रहा है जहाँलोग, विचार और संभावनाएँ आपस में जुड़ती हैं।
उन्होंने हाल ही में International Film Festival Delhi के दौरान हुए एक इंडस्ट्री राउंडटेबल का जिक्र किया, जहाँ “Orange Economy” को लेकर हुई गंभीर चर्चा में NDFF को भी आमंत्रित किया गया। इसमें सरकार के मंत्री, प्रमुख अफसर से लेकर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के कई प्रमुख फिल्मकार भी शामिल हुए।
इस पहल का ज़िक्र करते हुए उन्होने कहा किन सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के किसी भी अन्य क्षेत्र को सिनेमा के क्षेत्र में आगे बढ़ना है, तोpolicy, training और creative communityके बीच एक मजबूत तालमेल ज़रूरी है – और TCOTF उसी दिशा में एक ज़मीनी प्रयास है।

एक फिल्म, जो ठहरकर सोचने पर मजबूर करती है
इस सत्र का केंद्र रही फिल्म The Scientist Who Runs at Night, जिसेइसके निर्देशक MithunPramanik ने पेश किया।कोलकाता से आए मिथुन की यह फिल्म एक ऐसे वैज्ञानिक की कहानी कहती है, जो शोर-शराबे से दूर, अपने काम में लगातार लगे हुए हैं।
फिल्म पद्म श्री से सम्मानित वैज्ञानिक प्रोफेसर Sujoy Kumar Guhaके जीवन, काम और संघर्ष पर आधारित है – जिन्होंने दशकों तक मेल कन्ट्रासेप्टिवRISUG जैसी महत्वपूर्ण खोज पर काम किया – आज भी उसी समर्पण के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
फिल्म धीरे-धीरे खुलती है, और इसी धीमेपन में उसकी ताकत है।
दर्शकों का जुड़ाव
फिल्म खत्म होने के बाद जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह सिर्फ “अच्छी फिल्म” तक सीमित नहीं थी।
लोगों ने महसूस किया कि ऐसी कहानियाँ आज के समय में जरूरी हैं – क्योंकि ये हमें याद दिलाती हैं किलगन और धैर्य अब भी मायने रखते हैं।
फिल्म के पीछे का सफर
बातचीत में मिथुन प्रामाणिक ने बताया कि इस फिल्म को पूरा करने में उन्हेंकरीब एक दशकलगा।
यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं था, बल्कि एक लंबी यात्रा थी – जिसमें इंतज़ार था, चुनौतियाँ थीं, और कई बार अनिश्चितता भी।
उन्होंने साझा किया कि Canadian Broadcasting Corporation के सहयोग से यह फिल्म अपने अंतिम रूप तक पहुँच सकी।
लेकिन उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था उनका यह कहना कि
प्रो. गुहा जैसे लोग ही असली हीरो होते हैं – जो बिना किसी शोर के लगातार काम करते रहते हैं।
संवाद का खुला मंच
इसके बाद सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ, जिसमें दर्शकों ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।
फिल्ममेकिंग की प्रक्रिया से लेकर व्यक्तिगत अनुभवों तक – बातचीत कई दिशाओं में गई, और हर जवाब में एक नई परत खुलती गई।
श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी की फाउंडर-डायरेक्टर दलजीत वाधवा ने भी इस फिल्म और उसके विषय को युवाओं के लिए बेहद प्रेरणादायक बताया।

जहाँ बातचीत खत्म नहीं होती
कार्यक्रम के अंत में एनडीएफएफ की ओर वैभव मैत्रेय और हरिंदर कुमार ने मिथुन प्रामाणिक को सम्मानित किया गया, लेकिन असल मायने में बातचीत यहीं खत्म नहीं हुई। चाय के दौरान लोग छोटे-छोटे समूहों में बंटकर बातें करते रहे – कहीं फिल्म की चर्चा थी, कहीं नए ideas, और कहीं future collaborations की संभावना। शायद यहीTalk Cinema On The Floorकी असली पहचान है – यह सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि एक ऐसा स्पेस है जहाँ सिनेमा लोगों को जोड़ता है, और बातचीत को आगे बढ़ाता है।
