बिहार चुनाव 2025: NOTA ने दी सबसे कड़ी टक्कर, जनसुराज की जमीन पर दिखी गहरी चुनौती

18th November 2025

Central Desk

चुनाव सिर्फ राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षाओं की परीक्षा नहीं होते—ये जनता की उम्मीदों, सपनों और भरोसे की भी कसौटी होते हैं। हर पाँच साल में लोकतंत्र जनता से एक सवाल पूछता है: आप किसे अपना भविष्य सौंपना चाहते हैं?

लेकिन जब कुल मतों का 1.81%, यानी 9 लाख से अधिक वोट, NOTA पर पड़ते हैं, तो यह सिर्फ एक चुनावी आँकड़ा नहीं रहता—यह जनता की मौन चीख बन जाता है।

NOTA दबाना चुनाव से दूरी नहीं, बल्कि एक मजबूत विरोध है। यह वह पल है जब मतदाता कहता है, “हम वोट देने आए हैं, लेकिन किसी को चुनने लायक नहीं पाते।” यह निराशा भी है, थकान भी, और एक दर्द भरा संदेश भी—कि राजनीति ने लोगों की उम्मीदों को कहीं न कहीं घायल किया है। हर NOTA वोट उस टूटे हुए भरोसे की कहानी है, जो कहता है कि लोग बदलाव चाहते तो हैं, पर उन्हें भरोसेमंद विकल्प नजर नहीं आता। और यही बात लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा चेतावनी संकेत है।

क्योंकि जब जनता वोट डालते हुए भी किसी को न चुनने का निर्णय ले, तो असल समस्या मतदाता में नहीं, बल्कि राजनीति में होती है। इसी बात की तस्दीक करती है 240 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज के उम्मीदवारों को 59 सीटों पर नोटा से भी कम वोट मिले। प्रशांत किशोर जिसे चुनाव के पहले-पहले तक मीडिया और तमाम विश्लेषक भविष्य की उम्मीद बात रहे थे लोगों में उनके उम्मीदवारों से ज्यादा नोटा को वोट दिये. 59 यानी लगभग 25 प्रतिशत सीटों पर यह बात बिलकुल सही है. वहीं कुशेश्वर स्थान और नाथनगर ऐसी सीटें रही जहां उनके उम्मीदवारों नोटा से कड़ा मुकाबला लड़ते हुए क्रमश: 37 और 30 वोट से आगे रहे.

बिहार विधानसभा चुनाव के इस नतीजे ने एक बात साफ़ कर दी है—प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ज़मीन पर जितनी दिखाई दी, उतनी वोटों में नहीं उतरी। पूरे राज्य में एक पैटर्न बार-बार दोहराया गया: जनसुराज ने इस चुनाव में 240 सीटों पर मुकाबले में थी. पार्टी दिल बहलाने को यह तो कह सकती है कि हम कई सीटों पर तीसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरे लेकिन लेकिन ज्यादातर जगहों पर NOTA ने JSP को पछाड़ दिया। यानी जनता नाराज़ थी, बदलाव चाहती थी, लेकिन जनसुराज को विकल्प मानने के लिए तैयार नहीं दिखी।

अब इस पूरी तस्वीर को सीटों के डेटा के आधार पर समझते हैं—

सबसे पहले बात करते हैं उन सीटों की, जहां जनसुराज को दो से चार हज़ार वोट मिले, लेकिन NOTA को उससे ज्यादा। ये संख्या बहुत बड़ी है—अलीनगर, अररिया, बहादुरगंज, बायसी, बलरामपुर, बाराचट्टी, बारौली, अतरी, औरंगाबाद—लगभग हर सीट पर एक ही कहानी रही। उदाहरण के लिए अलीनगर में JSP को 2,275 वोट मिले, लेकिन NOTA पर 4,751 वोट पड़े. अररिया में JSP 2,434 पर रही और NOTA उससे आगे 3,610 पर। फारबिसगंज में तो JSP का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा—सिर्फ 977 वोट, जबकि NOTA 3,114 रहा। यह पैटर्न दिखाता है कि मतदाता असंतुष्ट था, लेकिन उसने जनसुराज को विकल्प नहीं माना।

अब दूसरे पैटर्न पर आते हैं—जहां JSP ने ठीक-ठाक यानी चार से छह हज़ार वोट पाए, लेकिन फिर भी NOTA आगे रहा। बेलदौर में JSP को 5,235 मिले, पर NOTA लगभग आठ हज़ार पर पहुंच गया। बोधगया में JSP चार हज़ार के करीब रही, लेकिन NOTA छह हज़ार के पास पहुंच गया। मधेपुरा, दरभंगा ग्रामीण, गौरा बौराम—इन सभी सीटों पर JSP की उपस्थिति थी, लेकिन जनता ने NOTA को ज्यादा पसंद किया।

फिर आते हैं तीसरे पैटर्न पर—जहां NOTA की बाढ़ दिखी। कांटी में NOTA ने 7,823 वोट लिए, महिषी में 6,671, धमदाहा में 6,781 और पिपरा तो सबसे आगे रहा—यहां NOTA दस हज़ार के ऊपर पहुंच गया। जबकि JSP आधे से भी कम, यानी पांच हज़ार पर अटकी रही। इन आंकड़ों से साफ़ पता चलता है कि गहरी नाराज़गी के बाद भी जनता JSP को अपनाने के लिए तैयार नहीं दिखी।

अब उन सीटों की बात करते हैं जहां जनसुराज तीसरे स्थान पर तो पहुंच गई, लेकिन NOTA फिर भी उससे आगे रहा। यह जनसुराज के लिए सकारात्मक और नकारात्मक—दोनों तरह का संकेत है। बाढ़, मनेर, मसौढ़ी, मीनापुर, परबत्ता, राघुनाथपुर, साहेबगंज और रानीगंज—इन आठ सीटों में JSP तीसरे नंबर पर आई, लेकिन NOTA ने उसे पीछे छोड़ दिया।

मीनापुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। JSP को 6,633 वोट मिले, लेकिन NOTA इससे भी ज्यादा—7,805 वोट लेकर आगे निकला। मसौढ़ी में JSP ने लगभग 4,700 वोट लिए, पर NOTA 5,146 पर था। रानीगंज में JSP सिर्फ 3,183 पर रही, लेकिन NOTA 5,119 पर पहुंच गया।

इन सीटों से एक बात बहुत साफ़ होती है—जनसुराज को कुछ वोट मिले, यह दिखाई तो दी, लेकिन जनता ने उसे भरोसे के विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं किया। और अब सबसे चौंकाने वाली सीट—राघोपुर, जहां तेजस्वी यादव खुद उम्मीदवार थे। यहां भी JSP को 2,399 वोट मिले, लेकिन NOTA 4,033 पर पहुंच गया। यह दिखाता है कि हाई-प्रोफाइल सीटों पर भी JSP मतदाताओं के मन में जगह नहीं बना सकी।

कुल मिलाकर इन सभी आंकड़ों का निष्कर्ष यह है—जनसुराज ने बिहार की राजनीति में चर्चा और उपस्थिति तो जरूर दर्ज कराई, लेकिन विश्वास नहीं जीत सकी। लंबी यात्रा, गांव-गांव बातचीत, भीड़… यह सब वोट में तब्दील नहीं हो पाया। जनता बदलाव चाहती थी, लेकिन JSP को वह बदलाव का माध्यम नहीं मान पाई। और यही वजह है कि राज्य के बड़े हिस्से में लोग NOTA को JSP से ऊपर रखकर चले गए। मतलब साफ है—जनसुराज अभी “विचार” की तरह मौजूद है, लेकिन “वोट वाली पार्टी” बनने में उसे लंबा सफर तय करना बाकी है।

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