RANCHI
रांची विश्वविद्यालय में इन दिनों डिग्री एवं डुप्लीकेट प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि विश्वविद्यालय के डिग्री अनुभाग में प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराने के नाम पर छात्रों एवं अभ्यर्थियों से मनमानी राशि की मांग का आरोप है। खासकर नौकरी एवं नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल अभ्यर्थी सबसे अधिक परेशान हैं, जिन्हें समय पर प्रमाण-पत्र नहीं मिलने के कारण मानसिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
वर्तमान में सहायक आचार्य सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं एवं नियुक्ति प्रक्रियाओं में सफल अभ्यर्थियों को अपने स्नातक एवं स्नातकोत्तर की मूल अथवा डुप्लीकेट डिग्री की आवश्यकता पड़ रही है। विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित शुल्क जमा करने और ‘अर्जेंट’ श्रेणी में आवेदन देने के बावजूद अभ्यर्थियों को कई-कई दिनों तक विश्वविद्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
एक पीड़ित अभ्यर्थी संजीव कुमार (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उन्होंने डुप्लीकेट डिग्री प्राप्त करने के लिए 1 जून को ही बैंक चालान, आवेदन-पत्र तथा सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ निर्धारित प्रक्रिया पूरी कर आवेदन जमा कर दिया था। इसके बावजूद उनका प्रमाण-पत्र जारी नहीं किया गया। उनका आरोप है कि आवेदन के बाद लगातार उनसे अतिरिक्त राशि की मांग की जाती रही।
पीड़ित अभ्यर्थी के अनुसार, नियुक्ति प्रक्रिया में दस्तावेज प्रस्तुत करने की समय-सीमा निकट होने के कारण वे लगातार विश्वविद्यालय का चक्कर काटते रहे। अंततः 18 जून को उनसे लगभग तीन हजार रुपये लेने के बाद डिग्री उपलब्ध कराई गई। अभ्यर्थी का कहना है कि इससे पहले उनसे पांच हजार से दस हजार रुपये तक की मांग की जा रही थी। नौकरी का भविष्य दांव पर होने के कारण उन्होंने किसी तरह राशि की व्यवस्था कर प्रमाण-पत्र प्राप्त किया।
यह मामला केवल एक अभ्यर्थी तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालय आने वाले कई छात्रों का कहना है कि निर्धारित शुल्क जमा करने के बाद भी प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में अनावश्यक विलंब किया जाता है, जिससे अभ्यर्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक एवं मानसिक दबाव बनता है। यदि आरोप सही हैं तो यह न केवल विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी चोट है।
छात्रों एवं अभिभावकों ने कुलपति, कुलसचिव तथा राज्य सरकार से मांग की है कि डिग्री एवं प्रमाण-पत्र निर्गत करने की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन एवं पारदर्शी बनाया जाए। साथ ही इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी छात्र को अपने ही अधिकार के दस्तावेज प्राप्त करने के लिए अपमान, आर्थिक शोषण और अनावश्यक दौड़-भाग का सामना न करना पड़े।
