125 दिन रोजगार का दावा, लेकिन काम के मौके घटने का आरोप; नए VBGRAMG नियमों पर भड़का नरेगा मोर्चा
Central desk
जमीनी स्तर पर काम करने वाले संगठन नरेगा संघर्ष मोर्चा ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए VBGRAMG (विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन-ग्रामीण) नियमों को संविधान द्वारा गारंटी दिए गए “काम के अधिकार” में बाधा बताया है। मोर्चा ने मांग की है कि VBGRAM योजना को वापस लिया जाए और मांग आधारित रोजगार गारंटी कार्यक्रम मनरेगा (MGNREGA) को फिर से लागू किया जाए।
जमीनी हालात की समीक्षा के बाद जारी एक प्रेस बयान में मोर्चा ने कहा कि मनरेगा लोगों के लंबे संघर्ष का परिणाम था। लेकिन आज काम के अधिकार के उसके मूल वादे को जल्दबाजी में, गैरकानूनी और असंवैधानिक तरीके से कमजोर किया जा रहा है। मोर्चा का आरोप है कि यह नया कानून तकनीकी सोच पर आधारित है और इसे राज्यों, मजदूरों तथा श्रमिक संगठनों से पर्याप्त परामर्श किए बिना तैयार किया गया है।
मोर्चा ने केंद्र सरकार के नए मसौदा नियमों का जिक्र करते हुए कहा कि VBGRAMG को मनरेगा के एक “बेहतर विकल्प” के रूप में पेश किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इसके तहत प्रत्येक परिवार को 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी जाएगी। लेकिन सरकार के अपने आंकड़ों और प्रस्तावित बजट आवंटन का विश्लेषण बताता है कि यह वादा न तो वित्तीय रूप से समर्थित है और न ही प्रशासनिक रूप से व्यवहारिक है। मोर्चा का कहना है कि अत्यधिक केंद्रीकरण और केंद्र सरकार के हाथों में निर्णय लेने की शक्ति होने के कारण इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू करना संभव नहीं होगा।
मोर्चा ने स्पष्ट कहा कि उसकी पहली मांग है कि VBGRAMG को वापस लिया जाए और मांग आधारित रोजगार गारंटी कार्यक्रम मनरेगा को बहाल किया जाए।
मोर्चा के अनुसार, नए कानून के तहत केंद्र सरकार ने प्रत्येक राज्य के लिए निश्चित आवंटन तय कर दिया है। साथ ही राज्यों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने बजट पारित हो जाने के महीनों बाद भी योजना के लिए 40 प्रतिशत राशि का प्रावधान करें। नरेगा संघर्ष मोर्चा के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक निखिल डे ने कहा कि यह कानून संघीय ढांचे को कमजोर करता है और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर असर डालता है।
अखिल भारतीय कृषि मजदूर यूनियन के महासचिव बी. वेंकट ने घोषणा की कि 1 जुलाई से पूरे देश में लगातार विरोध प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे। VBGRAMG को वापस लिए जाने तक विभिन्न कार्यक्रम चलाए जाएंगे, जिनमें जनप्रतिनिधियों से बातचीत, केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनाना तथा जनजागरण अभियान शामिल होंगे।
उन्होंने कहा कि मनरेगा के अधिकांश मजदूर महिलाएं हैं, जबकि लगभग 25 प्रतिशत श्रमिक दलित और आदिवासी समुदायों से आते हैं। उनके अनुसार मजदूरों पर यह हमला वास्तव में सामाजिक न्याय पर हमला है।
तकनीकी समस्याओं का जिक्र करते हुए मोर्चा ने राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन से जुड़ी मनरेगा श्रमिक कमला देवी का उदाहरण दिया। कमला देवी ने कहा कि डिजिटल उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था मजदूरों के लिए बेहद मुश्किलें पैदा कर रही है। उन्होंने बताया कि कई महिलाओं की आंखों की तस्वीरें मशीन ठीक से नहीं ले पातीं। कई कार्यस्थल जंगलों या दूरदराज के इलाकों में होते हैं, जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं होता, जिससे ऑनलाइन हाजिरी दर्ज नहीं हो पाती।
कमला देवी ने सवाल उठाया कि यदि सरकार नई तकनीक और नए नियम लागू करना चाहती है तो उनका बोझ केवल मजदूरों पर ही क्यों डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसी तकनीकों को अधिकारियों और प्रशासनिक कर्मचारियों पर क्यों नहीं लागू किया जाता। उन्होंने सरकार से रोजगार गारंटी वापस बहाल करने की मांग की।
उत्तर प्रदेश के सीतापुर के एक अन्य मनरेगा मजदूर जगन्नाथ ने बताया कि पिछले वर्ष भी उन्हें 100 दिन का पूरा रोजगार नहीं मिला। उन्होंने कहा कि कई बार ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने में तीन घंटे तक का समय लग जाता है। बहुत से मजदूर चेहरे की पहचान वाली मशीन में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कर पाते और काम छोड़कर लौट जाते हैं। नेटवर्क की समस्या के कारण जियोटैगिंग भी सही तरीके से नहीं हो पाती। इसके अलावा मोबाइल फोन के माध्यम से आवेदन करने की शर्त भी बड़ी बाधा है, क्योंकि कई मजदूरों के पास मोबाइल फोन नहीं हैं या वे पढ़ना-लिखना नहीं जानते।
निखिल डे ने कहा कि नए मसौदा नियमों में ई-केवाईसी आधारित नए जॉब कार्ड जारी करने का प्रावधान भी है। उनका दावा है कि इस डिजिटल व्यवस्था ने पहले से ही देश के कई हिस्सों में गंभीर समस्याएं पैदा की हैं और बड़ी संख्या में वास्तविक मजदूर लाभ से वंचित हुए हैं।
मोर्चा ने सरकार के 125 दिनों के रोजगार गारंटी के दावे को भी चुनौती दी है। उसका कहना है कि यह गारंटी केवल कागजों पर दिखाई देती है। मोर्चा के अनुसार, आठ दिन पहले राज्यों के लिए जारी अंतरिम आवंटन इस बात को दर्शाते हैं कि मौजूदा 100 दिनों के रोजगार स्तर को बनाए रखना भी मुश्किल होगा, जबकि सरकार 125 दिनों की गारंटी देने का दावा कर रही है।
मोर्चा ने विभिन्न आंकड़ों और ग्राफ के आधार पर विश्लेषण करते हुए कहा कि प्रति सक्रिय जॉब कार्ड प्रस्तावित आवंटन इतना कम है कि उससे 125 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराना संभव नहीं है। अधिकांश बड़े राज्यों में प्रस्तावित आवंटन घोषित गारंटी के आधे हिस्से को भी पूरा नहीं कर पाएगा। कई राज्यों में तो यह राशि 125 दिनों की गारंटी के केवल पांचवें हिस्से तक ही रोजगार उपलब्ध करा सकेगी।
मोर्चा द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार:
- आंध्र प्रदेश में प्रति सक्रिय जॉब कार्ड केवल 42.35 व्यक्ति-दिवस का रोजगार मिल सकेगा।
- छत्तीसगढ़ में यह संख्या 39.07 व्यक्ति-दिवस होगी।
- बिहार में 30.94 व्यक्ति-दिवस।
- कर्नाटक में 26.44 व्यक्ति-दिवस।
- मध्य प्रदेश में 25.66 व्यक्ति-दिवस।
- उत्तर प्रदेश में 27.50 व्यक्ति-दिवस।
- महाराष्ट्र में केवल 14.40 व्यक्ति-दिवस।
- हरियाणा में 13.78 व्यक्ति-दिवस।
इन आंकड़ों के आधार पर मोर्चा का कहना है कि सरकार द्वारा घोषित 125 दिनों की रोजगार गारंटी वास्तविकता से काफी दूर है।
अंत में नरेगा संघर्ष मोर्चा ने केंद्र सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखीं:
- VBGRAMG को तुरंत वापस लिया जाए और अधिक मजबूत मनरेगा को फिर से लागू किया जाए।
- मजदूरों को कानून के अनुसार न्यूनतम वैधानिक मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
- NMMS, फेसियल रिकग्निशन और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण जैसी व्यवस्थाओं को हटाया जाए तथा भ्रष्टाचार रोकने के लिए पारदर्शिता, शिकायत निवारण प्रणाली और सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) को लगातार जारी रखा जाए।
(Courtsy: ANewsclick Report)
