RANCHI
झारखंड सरकार ने छात्र आंदोलनों द्वारा मांग की गई जेपीएससी तथा जेएसएससी से नियुक्त होने वाली भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने, जांच करवाने और स्थगित करने के क्रम में झारखंड सरकार, कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग, रांची द्वारा दिनांक 18 अगस्त, 2026 को निर्गत पत्रांक संख्या 06/लो.से.आ.01-07/2026 का०-5402, 5403, 5404, 5405, 5406, 5407, 5408, 5409 के आलोक में झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा प्रकाशित 21 परीक्षाओं को रद्द किया गया, 17 परीक्षाओं को जांच के दायरे में लाया गया तथा 6 परीक्षाओं को स्थगित किया गया।
विदित हो कि झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा प्रकाशित विज्ञापन, जो वर्ष 2018 से पहले का था और जो बाद में प्रकाशित हुआ था, उनमें बहुत सारे विज्ञापन तथा छठी सीमित उपसमाहर्ता परीक्षा (11/2018), सीडीपीओ (21/2023), फूड सेफ्टी ऑफिसर (18/23), सिविल सेवा परीक्षा-2023 (01/2024), फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (04/2024), सहायक वन संरक्षक (03/24), झारखंड पात्रता परीक्षा-2024 (08/2025), वि.वि. में गैर-शैक्षणिक अधिकारियों के पद (09/2024) सहित 21 परीक्षाओं को रद्द किया गया, जबकि कमर्शियल टैक्स (लिमिट) परीक्षा (10/2010), पांचवीं सिविल सेवा परीक्षा (06/2013), सिविल जज जूनियर परीक्षा (10/2015) सहित 17 परीक्षाओं को जांच के दायरे में लाया गया। ऐसा इसलिए कि सबके सब संदेह के दायरे में हैं। सीआईडी जांच के क्रम में झारखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष सहित लगभग 20-25 लोग अब तक गिरफ्तार हुए। इतना ही नहीं, झारखंड लोक सेवा आयोग के सभी सदस्यों को इस्तीफा भी देना पड़ा, ताकि नियुक्ति से संबंधित सभी विज्ञापनों, परीक्षाओं एवं परिणामों की सूक्ष्मता से जांच-पड़ताल हो सके।
परंतु इसी कड़ी में झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग द्वारा निर्गत पत्र में राज्य अधीनस्थ विश्वविद्यालयों के असिस्टेंट प्रोफेसर के विज्ञापन संख्या 04/18 रेगुलर नियुक्ति तथा 05/18 बैकलॉग नियुक्ति के आधार पर हुई नियुक्तियों को शामिल नहीं किया गया है। क्या ये मान लिया जाए कि विगत 14 वर्षों में झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा प्रकाशित विज्ञापन और नियुक्ति में एकमात्र असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती परीक्षा ही साफ-सुथरी आयोजित हुई? अथवा इस परीक्षा को जानबूझकर सरकार जांच के दायरे से बाहर रखना चाहती है? अथवा इसे भी जांच के दायरे में लाने के लिए आंदोलन करने की जरूरत है? सवाल ये भी उत्पन्न हो रहा है कि असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति में स्क्रूटिनी, साक्षात्कार और परिणाम जिस समय किया गया, उस समय भी जेपीएससी के वही अध्यक्ष, सचिव, परीक्षा नियंत्रक और कर्मी सेवारत थे। फिर असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति हेतु प्रकाशित विज्ञापन, स्क्रूटिनी, साक्षात्कार तथा परीक्षाफल की जांच क्यों नहीं हो रही है?
विदित हो कि विगत आठ वर्षों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति संपन्न नहीं हो पाई है। टुकड़े-टुकड़े में विषयवार साक्षात्कार और परीक्षाफल दिया जा रहा है। असिस्टेंट प्रोफेसर हेतु विज्ञापन अगस्त, 2018 में प्रकाशित हुआ, साक्षात्कार और नियुक्ति प्रक्रिया 2020 से लेकर अब तक जारी है। तात्पर्य यह कि उसी विज्ञापन के आधार पर किसी विषय में पांच वर्ष पहले असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुए, जबकि कुछ विषयों का अब तक साक्षात्कार भी नहीं हुआ है। दैनिक अखबार से पता चलता है कि असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए क्षेत्रीय भाषा का विज्ञापन 2008 में प्रकाशित भी नहीं हुआ था, परंतु उन विषयों का विज्ञापन भी 2018 में बैकलॉग के रूप में प्रकाशित हुआ है। ऐसे अनगिनत अभ्यर्थी हैं, जिन्हें उनका एपीआई स्कोर दिखलाया ही नहीं गया। ऐसे सफल अभ्यर्थी भी हैं, जिनके पास गुड एकेडमिक डिग्री भी नहीं है। वास्तविकता यह है कि बैकलॉग नियुक्ति का उस समय विज्ञापन होना ही गलत था, पर सरकार ने विज्ञापन में गलत तरीके से बैकलॉग को शामिल किया और वह यहीं नहीं रुकी। उसने 4/18 की नियुक्ति प्रक्रिया को आरंभ न करके पहले 5/18 वाली बैकलॉग नियुक्ति की शुरुआत की तथा येन-केन प्रकारेण इसे पूरा कर सबको नियुक्त कर दिया गया। दूसरी ओर, आज तक 4/18 की नियुक्ति प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई है। असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह से संदिग्ध और गलत होने के बावजूद इसे बचाने का सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किया जाना कई सवाल उत्पन्न करता है, जिसकी जांच हर हाल में होनी चाहिए।
