बंगाल में नहीं चला ध्रुवीकरण का दांव! मुसलमानों की ‘खामोश रणनीति’ से BJP की सियासत बैकफुट पर

TANWIR AHMED

पश्चिम बंगाल में जैसे ही बीजेपी की सरकार बनी, वैसे ही हिंदू-मुस्लिम और गाय की राजनीति को हवा देने की कोशिश शुरू हो गई। मुख्यमंत्री शिवेंदु अधिकारी ने साफ तौर पर बयान दिया कि बंगाल में बकरीद के मौके पर गाय नहीं काटी जाएगी और ऐसा करने वालों पर कानूनी कार्रवाई होगी। बीजेपी की पूरी कोशिश थी कि बकरीद के नाम पर पूरे बंगाल में माहौल गर्म किया जाए, हिंदू-मुस्लिम तनाव पैदा हो और फिर उसी ध्रुवीकरण की राजनीति से चुनावी फायदा उठाया जाए। लेकिन इस बार बंगाल के मुसलमानों ने ऐसा जवाब दिया जिसने बीजेपी की पूरी रणनीति को हिला कर रख दिया। बंगाल के उलेमा, दानिश्वर, पढ़े-लिखे लोग, बुद्धिजीवी, आम जनता और मुस्लिम राजनीतिक लोगों ने समझदारी दिखाते हुए फैसला लिया कि इस बार कोई भी मुसलमान बड़े जानवर की कुर्बानी नहीं देगा और ना ही ऐसे जानवर खरीदे जाएंगे, ताकि नफरत फैलाने वालों को कोई मौका न मिले।

यहीं बीजेपी की राजनीति पूरी तरह फेल हो गई।

जिस मुद्दे को लेकर बीजेपी पूरे बंगाल में आग लगाना चाहती थी, मुसलमानों ने उसी मुद्दे को अपनी अक्ल, सब्र और सियासी समझदारी से खत्म कर दिया। मुसलमान जज़्बात में नहीं आया, बल्कि उसने यह समझ लिया कि सामने वाला क्या खेल खेलना चाहता है। दूसरी तरफ सबसे ज्यादा नाराज़गी उन लोगों में देखने को मिली जो गाय पालने और बेचने का काम करते हैं। उन्होंने सड़कों पर उतरकर हंगामा शुरू कर दिया। उनका कहना था कि हमने करोड़ों रुपए खर्च कर गाय पाली, अब अगर बिकेगी नहीं तो हम बर्बाद हो जाएंगे। यानी बीजेपी अपने ही फैसले में खुद फँसती नज़र आने लगी।

अब जब बीजेपी की ध्रुवीकरण की राजनीति कमजोर पड़ने लगी, तो फिर वही पुराने चेहरे सामने लाए गए। हुमायूं कबीर जैसे लोग, जिन पर पहले भी नफरत की राजनीति को हवा देने के आरोप लगते रहे हैं, जिसे बीजेपी ने 1000 करोड़ देकर बाबरी मस्जिद का मुद्दा उठवाया था, फिर वही अचानक बयान देने लगे कि “बंगाल में सदियों से गाय कटती आई है और कटती रहेगी, अगर कोई रोकेगा तो विरोध होगा।”

मुसलमानों को समझना होगा कि ऐसे बयान पूरी कौम की आवाज़ नहीं होते। यह वही लोग हैं जिन्हें हर बार सिर्फ इसलिए आगे किया जाता है ताकि मुसलमानों को भड़काया जा सके, उन्हें जोश में लाया जाए और फिर गाय के नाम पर पूरे बंगाल में हिंदू-मुस्लिम राजनीति शुरू हो सके। बीजेपी चाहती है कि मुसलमान भावनाओं में बह जाए, ताकि फिर वही पुराना खेल खेला जा सके लेकिन इस बार बंगाल का मुसलमान बहुत होशियार है।

उसे पता है कि कब क्या करना है, कैसे करना है और किस जाल से बचना है। आज मुसलमान ने यह साबित कर दिया कि अगर कौम अक्ल से काम ले तो बड़े से बड़ा सियासी षड्यंत्र भी नाकाम किया जा सकता है।

मुझे लगता है कि बीजेपी इस बार अपने ही बनाए हुए जाल में बुरी तरह फँस चुकी है। उसकी राजनीति को वही मुसलमान शांत दिमाग और समझदारी से खत्म कर रहा है, जिसे हमेशा जज़्बाती दिखाने की कोशिश की जाती थी।

अब चाहे कितने भी दलाल और भड़काऊ चेहरे सामने लाए जाएं, बंगाल का मुसलमान समझ चुका है कि उसे नफरत की राजनीति का मोहरा नहीं बनना है।

(लेखक का परिचय: तनवीर अहमद, प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम ने एक बड़ी लकीर खींची है। वे रांची में रहते हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *