जीतू मुंडा अनपढ़ जरूर था, लेकिन सोई संवेदनहीन व्यवस्था को जगाना कैसे है जानता था

VISHAD KUMAR

पिछले 27 अप्रैल 2026 से आज तक पूरे देश में एक ऐसी खबर सोशल मीडिया से लेकर समाचार पत्रों में काफी सुर्खियों में तैर रही है जो मानवता को ही शर्मसार नहीं करती बल्कि किसी भी संवेदनशील इन्सान के रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है।

यह घटना ओडिशा के क्योंझर जिले की है जहां 55 वर्षीय एक आदिवासी बुजुर्ग जीतू मुंडा तीन महीने पहले दफनाइ गई अपनी बहन कलारा मुंडा के कंकाल को कब्र से निकालकर अपने कंधे पर लादकर चिलचिलाती धूप में तीन किलोमीटर पैदल चलकर ओडिशा ग्रामीण बैंक पहुंचता है और बहन के कंकाल को बैंक के गेट पर रखकर भीतर जाकर कहता है – “लो हमारी बहन आ गई, अब इसका पैसा दे दो।”

यह घटना हमारी सिस्टम की दस्तावेजी प्रक्रियाओं की जटिलता पर ही केवल सवाल खड़ी नहीं करती, बल्कि सिस्टम में मौजूद उन व्यक्तित्वों की मानवीय संवेदनहीनता और उनके मनमानेपन का पर्दाफाश भी करती है।

वहीं, यह घटना जीतू मुंडा के भीतर अपने अधिकार को लेकर उसकी बेचैनी को भी दर्शाती है और प्रेरित करती है कि, कैसे हमारे समाज के उपेक्षित अशिक्षित वर्ग को इस संवेदनहीन व्यवस्था और सिस्टम की दस्तावेजी प्रक्रियाओं से निपटा जा सकता है।

27 अप्रैल 2026 को ओडिशा के क्योंझर जिले में हैरान करने वाला एक मामला तब सामने आया आदिवासी जीतू मुंडा अपनी मरी हुई बहन का बैंक में जमा पैसा लेने के लिए जब दर्जनों बार चक्कर लगाने के बाद उससे कहा गया कि “बहन को लेकर आओ तब पैसा मिलेगा।” उसके बाद गरीबी, निरक्षरता से घिरा और हमारी सिस्टम की कई पेचीदगियों से अनजान जीतू मुंडा तीन महीना पहले मर चुकी बहन कलारा मुंडा का कंकाल को लेकर चिलचिलाती धूप में तीन किलोमीटर तक पैदल चलते हुए वह बैंक पहुंचता है और बैंक कर्मियों को कहता है – “लो हमारी बहन आ गई, अब इसका पैसा दे दो।”

कंकाल देखते ही बैंक में अफरा-तफरी मच गई।

दरअसल ओडिशा के क्योंझर जिला अंतर्गत दीयानाली गांव का रहने वाला जीतू मुंडा की बहन कलारा मुंडा की मौत 26 जनवरी 2026 को हो गई थी।

कलारा का खाता ओडिशा ग्रामीण बैंक की मल्लीपासी शाखा में था। खाते में 19,300 रुपये जमा थे। कलारा के पति और इकलौते बेटे की मौत पहले ही हो चुकी है। ऐसे में जीतू ही अपनी बहन का एकमात्र वारिस या दावेदार बचा था।

 जीतू मुंडा ने तीन महीने पहले मर चुकी और दफनाइ जा चुकी अपनी बहन कलारा मुंडा की बचत राशि निकालने के लिए ओडिशा ग्रामीण बैंक से संपर्क किया था।

बैंक अधिकारियों ने दावा प्रक्रिया शुरू करने से पहले उससे आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा था। औपचारिक प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ और दस्तावेजी प्रमाण की आवश्यकता को न समझ पाने के कारण मुंडा बार बार बैंक जाता रहा, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। न तो जीतू मुंडा बैंक कर्मियों की दस्तावेजी प्रक्रियाओं समझ पाता था और न ही बैंक कर्मी उसे सहज व सरल तरीके से उसे दस्तावेजी प्रक्रियाओं को समझा पाते थे।

अंततः उसे यही समझ में आया कि बैंक वाले उसकी बहन को बिना देखे पैसा नहीं देंगे, तब वह तीन महीने पहले कब्र में दफनाइ गई बहन के कंकाल को खोदकर निकाला और चिलचिलाती धूप में तीन किलोमीटर तक पैदल चलकर बैंक पहुंचा तथा बहन के कंकाल को बैंक के गेट पर रखकर इसकी सूचना अंदर बैंक कर्मियों को दी। जिसके बाद बैंक में घबराहट फैल गई तथा पूरे क्षेत्र में सनसनी।

जिसे देखकर और सारी कहानी जानकर वहां मौजूद ग्राहकों में से कई लोगों की आंखों से आंसू निकल आये, तो कई लोगों का गुस्सा बैंक प्रबंधन पर फूट पड़ा।

लोगों का कहना था – ”क्या एक गरीब व अनपढ़ आदमी के लिए अपना ही पैसा पाना इतना कठिन है? बैंक चाहता तो उसके पंचायत सरपंच से तस्दीक कर सकता था या फील्ड विजिट कर सकता था, लेकिन इनकी तो मानवीय संवेदना ही मर चुकी है, इनके लिए मानवता से ज्यादा कागजी कार्यवाही हो गई।”

यहां हमारे समाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी कई सवाल उठते हैं।

क्या गांव के लोगों, क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, उनके संपर्क के लोगों या पंचायत व प्रखंड से संबंधित कर्मियों को जीतू की इस परेशानी व उसका लगातार बैंक का चक्कर लगाने के कारणों जानकारी नहीं थी?

जबकि गांव-घर में ऐसा संभव नहीं है, सभी एक दूसरे के दांत में फंसी रोटी की भी खबर रखते हैं। तो ज़ाहिर है हम या तो केवल मतलबी हो गए हैं या हमारी गंवई संवेदना भी मरती जा रही है।

इस अप्रत्याशित घटना के बाद क्षेत्र की पाटणा पुलिस मौके पर पहुंची और प्रभारी निरीक्षक (आईआईसी) किरण प्रसाद साहू ने साफ कहा कि “जीतू मुंडा पढ़ा-लिखा नहीं है। आदिवासी है और कानूनी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान है। जीतू को नहीं पता कि कानूनी वारिस या नॉमिनी क्या होता है। बैंक अधिकारी भी उसे मृतक के खाते से पैसे निकालने की प्रक्रिया नहीं समझा पाए।”

साहू के अनुसार बैंक मैनेजर ने नॉमिनी और पैसे निकालने की प्रक्रिया ठीक से समझाने के बजाय “बहन को लेकर आओ” कहकर स्थिति को और मुश्किल बना दिया।

अधिकारियों ने बताया, “यह घटना मुख्य रूप से जागरूकता की कमी के कारण घटी।” उन्होंने आगे बताया कि मुंडा को पैसे निकालने की सही प्रक्रिया के बारे में समझाया गया। बाद में वे घर लौट आए और शव को दोबारा दफना दिया।

मामला हाईलाइटेड होने पर पाटणा प्रखंड के अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि जीतू मुंडा को बहन कलारा मुंडा के खाते में जमा राशि पर दावा करने के लिए आवश्यक कानूनी उत्तराधिकार प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज प्राप्त करने में सहायता की जाएगी।

यह भी बड़ा सवाल है कि आखिर बिना हंगामा किए हमारा सिस्टम अंधा व बहरा क्यों बना रहता है।

तमाम घटनाक्रम से एक सवाल बार-बार कौंधता है कि इस तरह की घटनाओं के पात्र प्रायः आदिवासी व दलित समुदाय के ही लोग ही क्यों होते हैं?

जिसका जवाब कई सवालों से गुजरता हुआ सामने आता है।

मानव विकास के कई चरण पार कर जाने और समय समय पर बदलती सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाएं, जिसमें हमारी 77 वर्षों की आजादी भी शामिल है, के बाद भी आज आदिवासी व दलित समुदाय के अधिसंख्य लोग अशिक्षा और आर्थिक आधार के शिकार हैं, जिसका ही नतीजा हैं जीतू मुंडा जैसे लोगों का जीवन आधार।

कहना ना होगा कि जीतू मुंडा अनपढ़ और कानूनी प्रक्रियाओं से अनजान था, लेकिन यह तो तय है कि उसको इसका एहसास जरूर था कि नींद का नाटक वाली व्यवस्था को जगाने के लिए उसकी आंखों को कोंचना पड़ता है, वह वही किया। जो भविष्य में व्यवस्था की संवेदनहीनता के खिलाफ प्रेरणा का स्रोत न जाए।

(लेखक का परिचय: विशद कुमार सीनियर और सजग पत्रकार हैं। लगभग चार दशकों से रिपोर्टिंग कर रहे हैं और धारदार रिपोर्टिंग व आलेखों के लिए जाने जाते हैं)

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