Md Salahuddin
हर साल 18 दिसंबर आता है, और अपने साथ वह ‘संवैधानिक रस्म’ लेकर आता है जिसे हम विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस कहते हैं। आज के दिन बड़े-बड़े मंचों से विविधता में एकता के कसीदे पढ़े जाएंगे और उन कागजी पन्नों की धूल झाड़ी जाएगी, जिन पर कभी बाबा साहब अंबेडकर ने अल्पसंख्यकों के संरक्षण की कसमें लिखी थीं। लेकिन आज के दौर में अधिकार मनाना एक लक्जरी बन गया है, खासकर तब जब आपकी पहचान ही आपकी सबसे बड़ी चुनौती बना दी गई हो।
लोकतंत्र की ‘अनोखी’ व्याख्या: भारत, जिसे लोकतंत्र की जननी कहा जाता है, वहां अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की स्थिति इतनी अद्भुत हो चुकी है कि उसे समझने के लिए अब संविधान की नहीं, बल्कि टीवी डिबेट्स के शोर की जरूरत पड़ती है। विडंबना यह है कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ अधिकारों की रक्षा का मतलब है—उनका धीरे-धीरे गायब हो जाना। आज अधिकार शब्द मुस्लिम समुदाय के लिए किसी पुराने किस्से जैसा लगने लगा है। उनकी नागरिकता पर सवाल उठाना देशभक्ति का नया पैमाना है, और उनके आर्थिक बहिष्कार की अपीलें अब विकास की नई परिभाषा बन गई हैं।
छीनते अधिकार और बुलडोजर न्याय: जब हम अधिकारों की बात करते हैं, तो भोजन, पहनावा और इबादत के मौलिक अधिकार सबसे ऊपर आते हैं। विडंबना देखिए, आज किसी का खान-पान तय करना भीड़ का काम है और किसी का घर सलामत रहेगा या नहीं, यह संविधान नहीं बल्कि बुलडोजर तय कर रहा है। मुस्लिम समुदाय को जिस तरह से हाशिए पर धकेला जा रहा है, वह लोकतंत्र के चेहरे पर एक गहरा धब्बा है। शिक्षा और रोजगार में हिस्सेदारी की बात तो पुरानी हो गई, अब तो बस अस्तित्व बचा लेने की जद्दोजहद ही सबसे बड़ा अधिकार दिवस बन गया है।
दुष्परिणाम: एक खोखला भविष्य एक विशाल आबादी को डर और असुरक्षा के साये में रखकर हम किस ‘विश्व गुरु’ बनने का ख्वाब देख रहे हैं? इसके दुष्परिणाम केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहेंगे। जब देश की 20 करोड़ आबादी खुद को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस करने लगे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की बुनियाद में दीमक लग चुकी है। नफरत की इस राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि हमने असल मुद्दों—महंगाई, बेरोजगारी और स्वास्थ्य—को सांप्रदायिकता की चादर तले दफन कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हम अपनी धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटते हैं, लेकिन घर के अंदर का आंगन नफरत की आग में झुलस रहा है।
निष्कर्ष: विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस 2025 पर यह लेख कोई बधाई संदेश नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत का आईना है। यदि आज भी हम चुपचाप अधिकारों का छिनना देखते रहे, तो आने वाले समय में अधिकार केवल शब्दकोशों में मिलेंगे, सड़कों पर नहीं। अल्पसंख्यकों को दबाकर कोई भी राष्ट्र महान नहीं बन सकता; महानता सबको साथ लेकर चलने में है, न कि किसी को डर की दहलीज पर खड़ा करने में। क्या हम आज के दिन सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेंगे, या उस संविधान को फिर से जिंदा करेंगे जो कहता है कि यह देश सबका है?

(नोट- लेखक मोहम्मद सलाहउद्दीन शिक्षक और माही के सदस्य हैं। इस आलेख में आये विचार लेखक के निजी हैं। इनका उलगुलान डॉट इन से कोई संबंध नहीं है)
