UGC के नए नियमों से क्यों मचा बवाल, क्या वाकई सवर्णों के खिलाफ हैं प्रावधान?

समानता समितियों से लेकर EOC तक: नए फरमान पर विरोध, सवाल और सुप्रीम कोर्ट की एंट्री

NEW DELHI 

उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाए गए यूजीसी के नए नियमों ने देशभर में सियासी और सामाजिक तापमान बढ़ा दिया है। इन नियमों को लेकर जहां सरकार समावेशी माहौल की बात कर रही है, वहीं कई संगठन इसे सवर्ण वर्ग के खिलाफ बताया जा रहा है। इसी मुद्दे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भी भेजे गए हैं।

यूजीसी के नए प्रावधानों के तहत देश के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए समानता समितियों का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। नियमों के अनुसार, इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी। अधिकारियों का कहना है कि इसका मकसद पिछड़े और वंचित वर्गों की शिकायतों का समय पर समाधान और कैंपस में बराबरी का माहौल बनाना है।

इसके साथ ही हर संस्थान में एक समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre – EOC) खोलना अनिवार्य किया गया है। यह केंद्र वंचित वर्गों के लिए चल रही योजनाओं की निगरानी करेगा और छात्रों को शिक्षा, आर्थिक सहायता और सामाजिक मुद्दों पर मार्गदर्शन देगा। जिन कॉलेजों में समिति के लिए न्यूनतम सदस्य नहीं होंगे, वहां संबंधित विश्वविद्यालय का EOC यह जिम्मेदारी निभाएगा।

अधिसूचना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि EOC स्थानीय प्रशासन, पुलिस, मीडिया, नागरिक समाज, गैर-सरकारी संगठनों और विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ समन्वय कर जरूरतमंद मामलों में कानूनी सहायता भी सुनिश्चित करेगा। साथ ही, शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक और तय समयसीमा में कार्रवाई अनिवार्य होगी। नियमों का पालन न करने वाले संस्थान यूजीसी की योजनाओं से वंचित हो सकते हैं।

नए नियमों के तहत इक्विटी स्क्वॉड, इक्विटी एंबेसडर और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल जैसी व्यवस्थाएं भी की गई हैं। समितियों को साल में कम से कम दो बार बैठक और रिपोर्ट जारी करनी होगी, जिसमें छात्र संख्या, ड्रॉपआउट, शिकायतों और उनके निपटारे का ब्योरा शामिल रहेगा।

हालांकि, इन प्रावधानों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों ने इसे संविधान और सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया है। उनका आरोप है कि समानता की आड़ में सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं। इसी बीच यूजीसी के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में नियम 3(सी) को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है।

गौरतलब है कि इन नियमों का मसौदा फरवरी 2025 में सार्वजनिक किया गया था, जो रोहित वेमुला और पायल ताडवी मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद तैयार किया गया। अब इस पूरे मुद्दे पर सरकार, यूजीसी और अदालत की भूमिका पर देश की नजरें टिकी हुई हैं।

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