NITISHA KHAKHO
सजाने से ज़्यादा
अब ख़ुद को समेटने की
कला सीखनी है
मेरे अस्तित्व को।
देह भर तक ही
तुमने जाना है मुझे—
कुछ मांस के लोथड़ों तक
अटकती रही तुम्हारी रूह।
जबकि
स्त्री काया के भीतर
एक विस्तृत दुनिया है,
जिस तक पहुँचने की कोशिश
बहुत कम मस्तिष्कों ने की है।
तुमने तो बस गुज़ारा है
सान्निध्य—
हम औरतों के जननांगों से
पाई है यह दुनिया।
फिर भी
वही सबसे अधिक
अपवित्र और उपेक्षित ठहराई जाती है।
क्षोभ होता है
हर उस शब्द से
जो तुम देते हो
बहुत सहजता से—
गाली के रूप में,
ठहाकों के रूप में,
अपने पुरुषत्व के उत्सव में।
कभी सोचा है
कितने उथले और हल्के हो जाते हो तुम
अपने इन व्यवहारों में।
अपनी निज लड़ाइयों में भी
तुम्हारे लिए
गाली का रूप
सिर्फ़ स्त्री देह ही क्यों होता है?
ख़ैर—
तुम्हारा ज्ञान,
तुम्हारा अस्तित्व
शून्य हो जाता है
जब तुम कहते हो
कि युगों से
नहीं समझ पाए
स्त्री मन की थाह।
क्योंकि समझा ही नहीं तुमने
उस काया को
जो सींचती रही कोख में तुम्हें,
हर एक बूँद से
जिसने तुम्हें रचा और गढ़ा ।
पर वही
तुम्हारी चाहत न बन सकी,
और चाहत बनी भी
तो बस भोग्य रूप में।
सहचरनी बनने देते
तो सभ्यताओं का विकास
एक ग्लोब से परे
जगतों तक का हाल
समय रहते जान पाता।
परंतु
आँखों में लूट
और शक्ति का पट्टा बांधे
कैसे देख पाओगे तुम
अपना ही दोष?
सहज नहीं हैं
ज़िंदगानियाँ
इस विश्व सभ्यता में।
फिर भी
चाहो तो आज भी
गढ़ी जा सकती हैं
समानता और ईमानदारी की चेष्टाएं-
जो विस्तार देंगी
संपूर्ण मानव जगत को।
बस
सम्बोधन करना होगा
मस्तिष्क से नहीं,
अंतस् से।
…………….
कवियत्री का परिचय: नीतिशा बी.एस.के. कॉलेज, मैथन (झारखंड) में हिंदी विभाग की अध्यक्ष हैं। सामयिक विषयों पर लगातार लिखती हैं और मीरा फेलोशिप सहित कई सम्मान पा चुकी हैं।
