मातृभाषा ही पहचान की जड़: RU के टीआरएल संकाय में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर भाषा संरक्षण का संकल्प

RANCHI

रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस उत्साह, संवेदना और भाषाई प्रतिबद्धता के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य मातृभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और व्यवहारिक उपयोग को बढ़ावा देना तथा नई पीढ़ी को अपनी भाषाई जड़ों से जोड़ना रहा। आयोजन में विभिन्न विभागों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी देखी गई।

कार्यक्रम का संचालन कुँड़ुख विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बन्दे खलखो ने किया। उन्होंने अपने प्रारंभिक वक्तव्य में कहा कि मातृभाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि समुदाय की स्मृति, संस्कृति और जीवन-दृष्टि की वाहक होती है। धन्यवाद ज्ञापन पूजा कच्छप ने प्रस्तुत किया।

अध्यक्षीय संबोधन देते हुए नागपुरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नन्द तिवारी ने मातृभाषा की तुलना माँ के दूध से करते हुए कहा कि जैसे माँ का दूध जीवन की पहली शक्ति है, उसी प्रकार मातृभाषा बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना की पहली आधारशिला है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अपनी मातृभाषा पर गर्व करना और उसका व्यवहारिक उपयोग करना ही उसके संरक्षण का सबसे प्रभावी मार्ग है।

डॉ. रीझु नायक ने भाषाई अस्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाषा ही व्यक्ति और समाज की पहचान का मूल आधार है। यदि भाषा कमजोर होती है तो सांस्कृतिक पहचान भी क्षीण हो जाती है। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे मातृभाषाओं में अधिक से अधिक साहित्यिक सृजन करें और दैनिक संवाद में भी अपनी भाषा का प्रयोग बढ़ाएँ।

मुंडारी विभाग के डॉ. किशोर सुरिन और डॉ. बीरेंद्र कुमार महतो ने अपनी कविताओं के माध्यम से मातृभाषा और धरती के गहरे संबंध को रेखांकित किया। उनकी पंक्तियाँ –

“यह धरती सिर्फ़ पत्थरों और वनों की नहीं,

यह स्वर की धरती है,

जहाँ झारखंड की हवाओं में

पीढ़ियों की आवाज़ें गूंजती हैं।”,  ने उपस्थित श्रोताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ते हुए भाषाई विरासत के प्रति सजग रहने का संदेश दिया।

कार्यक्रम में डॉ. करम सिंह मुण्डा, डॉ. बीरेंद्र कुमार सोय, शकुंतला बेसरा, लक्ष्मण उरांव, महेन्द्र सखुआर और अजीत कुमार ने भी मातृभाषाओं की वर्तमान स्थिति, शैक्षणिक उपयोग, शोध की संभावनाओं और डिजिटल युग की चुनौतियों पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि तकनीकी दौर में मातृभाषाओं को डिजिटल माध्यम, पाठ्यक्रम और रचनात्मक लेखन से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

मौके पर नागपुरी, कुँड़ुख और मुंडारी विभाग के शिक्षकगण, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में सभी ने मातृभाषाओं के संरक्षण और व्यवहारिक उपयोग को बढ़ाने का सामूहिक संकल्प लिया।

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