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एलपीजी संकट ने देशभर में काम कर रहे बिहार के प्रवासी मजदूरों की जिंदगी पर गहरा असर डाला है। दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में काम कर रहे हजारों मजदूर अब ट्रेनों से भर-भरकर अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं। गैस की भारी किल्लत और बढ़ती कीमतों ने उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है।
पटना के दानापुर स्टेशन पर लौटे मजदूरों ने बताया कि बीते कुछ हफ्तों से गैस की कमी के कारण खाना बनाना बेहद मुश्किल हो गया था। कई जगहों पर मजदूरों को लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ा, लेकिन बाद में लकड़ी भी मिलनी बंद हो गई। हालात ऐसे हो गए कि कई परिवारों को रुखा-सुखा खाकर दिन काटना पड़ा, जबकि बच्चों के लिए खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया।
कंपनियों ने निकाला, मजदूरी भी नहीं मिली
कई मजदूरों ने बताया कि गैस संकट के साथ ही फैक्ट्रियों और कंपनियों में काम भी कम होने लगा। कुछ को नौकरी से निकाल दिया गया, तो कई को पूरी मजदूरी तक नहीं मिली। ऐसे में उनके पास गांव लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। मजदूरों का कहना है कि हालात सुधरने के बाद ही वे दोबारा काम की तलाश में बाहर जाएंगे।
दिल्ली, पंजाब और अन्य शहरों में छोटे उद्योग और कारखाने भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। कई जगहों पर गैस की आपूर्ति ठप होने से फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ीं। इससे न सिर्फ मजदूरों का रोजगार छिना, बल्कि छोटे व्यापारियों की कमाई पर भी गहरा असर पड़ा है।
महंगी गैस ने बढ़ाई परेशानी
मजदूरों के मुताबिक, जहां पहले गैस सस्ती मिलती थी, वहीं अब उसकी कीमत कई गुना बढ़ गई है। कई जगहों पर गैस 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जो उनकी आमदनी के हिसाब से बहुत ज्यादा है। होटल और ढाबों में भी खाने के दाम बढ़ गए हैं, जिससे रोज कमाने-खाने वाले मजदूरों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो गया है।
गांव लौटकर नई चुनौती
अब ये मजदूर अपने गांव लौट तो रहे हैं, लेकिन वहां भी उनके सामने रोजगार की बड़ी चुनौती है। कई मजदूरों ने कहा कि फिलहाल वे परिवार के साथ रहेंगे और हालात सामान्य होने का इंतजार करेंगे।
एलपीजी संकट ने जिस तरह से देशभर में प्रवासी मजदूरों की जिंदगी को प्रभावित किया है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि संकट के समय सबसे ज्यादा मार आखिर गरीब और मजदूर वर्ग पर ही क्यों पड़ती है।
