ईसा उन नामों में से हैं जो ईसाई और मुस्लिम के बीच दीवार नहीं, पुल बनकर खड़े हैं, तो फिर…

G MISHRA

ईसा उन गिने–चुने नामों में से हैं जो दो धर्मों के बीच दीवार नहीं, पुल बनकर खड़े दिखाई देते हैं. ईसाइयों के लिए वह आस्था का केंद्र हैं, और मुसलमानों के लिए एक महान पैगंबर. एक ही व्यक्तित्व, दो अलग धार्मिक व्याख्याएँ—और यहीं से वह सवाल जन्म लेता है, जो अक्सर हैरान करता है, उलझाता है और बहस में बदल जाता है. इस वीडियो में हम उन्हीं उलझनों की परतें खोलने की कोशिश करेंगे  न बहस के लिए, न फ़ैसले सुनाने के लिए—बल्कि यह समझने के लिए कि अलग रास्तों पर चलते हुए भी कुछ किरदार कैसे साझा हो जाते हैं, और फिर भी उनके अर्थ अलग-अलग क्यों रह जाते हैं….

आज क्रिसमस है. ईसा मसीह का जन्म दिन है. क्या ईसा सिर्फ ईसाइयों के थे नहीं इस्लामिक ग्रंथों में भी उनका जिक्र है तो फिर मुसलमान क्रिसमस क्यों नहीं मनाते. इस सवाल को समझेंगे लेकिन उससे भी पहले यह समझना जरूरी है कि इस्लाम और ईसाइयत का रिश्ता क्या है? जिसे अक्सर या तो अनदेखा कर दिया जाता है या फिर जानबूझकर ग़लत समझा जाता है.

यह बात कई लोगों को चौंकाती है कि इस्लाम भले ही ईसा मसीह के जन्म का उत्सव नहीं मनाता, लेकिन जीसस की इज़्ज़त करता है. सिर्फ़ इज़्ज़त ही नहीं, बल्कि ईसा को मानना मुसलमान होने की बुनियादी शर्तों में से एक है. मुसलमानों की नज़र में ईसा मसीह ईसाइयों के पैगंबर हैं और यह मान्यता किसी हाशिये की बात नहीं, बल्कि इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है.

इस्लाम की पवित्र किताब क़ुरान ईसा मसीह को एक ऐसी अहम शख़्सियत के तौर पर देखती है जो पैगंबर मुहम्मद से पहले आए थे. हकीकत यह है कि जीसस, जिन्हें अरबी ज़ुबान में ईसा कहा जाता है, का ज़िक्र क़ुरान में कई बार हुआ है—यहां तक कि पैगंबर मुहम्मद से भी ज़्यादा बार. यानी ईसा इस्लाम में किसी बाहरी या पराए धर्म-चरित्र की तरह नहीं आते, बल्कि उसकी धार्मिक स्मृति का हिस्सा हैं.

मेरी ही मरियम हैं…. आमतौर से क्लिशे के तौर पर यह बात दोहराई जाती है कि ममता का कोई मजहब नहीं होता. लेकिन ईसाई और इस्लामिक धार्मिक कहानियों में यह स्वर सबसे ऊंचे टोन सुनाई देता है. यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि इस्लाम की पवित्र किताब में सिर्फ़ एक ही महिला का नाम लेकर ज़िक्र किया गया है—और वह हैं वर्जिन मेरी, जिन्हें अरबी में मरियम कहा जाता है. क़ुरान में मरियम के नाम पर पूरा एक अध्याय है, जिसमें ईसा मसीह के जन्म की कहानी आती है.

लेकिन इस्लाम में ईसा के जन्म की जो कहानी है, वह बाइबिल से अलग है. यहां न जोसेफ़ हैं, न चरवाहे, न फरिश्तों का कोई उत्सव, न तबेले या नांद का ज़िक्र. मरियम अकेली हैं. रेगिस्तान में. एक सूखे हुए खजूर के पेड़ के साये में. वहीं वह ईसा को जन्म देती हैं.

और तभी एक चमत्कार होता है. उनके खाने के लिए खजूर गिरते हैं और उनके क़दमों के पास पानी का एक सोता फूट पड़ता है.

एक अविवाहित महिला के पास एक बच्चे का होना, समाज में उसके किरदार पर सवाल खड़े कर सकता था. लेकिन इसी जगह इस्लामी कथा एक अहम मोड़ लेती है. नवजात ईसा बोलते हैं. ईश्वर के दूत की तरह. और वही आवाज़ एक मां को निर्दोष साबित कर देती है.

तो फिर मुसलमान क्रिसमस क्यों नहीं मनाते? सवाल जायज़ है. पर इसका जवाब किसी झगड़े में नहीं बल्कि मान्यताओं में एक स्वीकार में छिपा है. और यहीं से असली फर्क समझ में आता है. इस्लाम ईसा को मानता है, लेकिन ईसा की उस पहचान को नहीं मानता जिस पर क्रिसमस टिका है. ईसाइयत में ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, ईश्वर स्वयं मानव रूप में धरती पर आए ऐसा ईसाइयों का मानना है. क्रिसमस उसी विश्वास का उत्सव है. इस्लाम इस धारणा को स्वीकार नहीं करता. इस्लाम के मुताबिक ईसा एक महान पैगंबर यानी संदेश वाहक हैं—न ईश्वर के पुत्र और न ईश्वर का अवतार.

इसीलिए मुसलमान ईसा का सम्मान करते हैं, वे ईसा को “अलैहिस्सलाम” कहते हैं उनका ज़िक्र करते समय कहते हैं “उन पर शांति हो”, उनके दोबारा लौटने में विश्वास रखते हैं, लेकिन उनके जन्म का धार्मिक उत्सव नहीं मनाते. दरअसल इस्लाम में किसी भी पैगंबर का जन्मदिन धार्मिक त्योहार नहीं है—न ईसा का, न खुद मुहम्मद का.

मुस्लिम साहित्य में ईसा की तारीफ़ क़ुरान के बाद भी लगातार होती रही है. सूफ़ी विचारक अल-ग़ज़ाली उन्हें “आत्माओं का पैगंबर” कहते हैं. इब्न अरबी उन्हें “संतों की मुहर” बताते हैं. मुस्लिम दुनिया में आज भी लड़कों के नाम ईसा और लड़कियों के नाम मरियम आम हैं—जो ईसा और मैरी से जुड़ी स्मृति को ज़िंदा रखते हैं.

अब ज़रा ठहरकर सोचिए—क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ईसाई धर्म को मानने वाला कोई परिवार अपने बेटे का नाम मुहम्मद रखे?

यही वो ऐतिहासिक असंतुलन है जो दोनों धर्मों के रिश्ते को जटिल बनाता है. इस्लाम ईसा से परिचित है, क्योंकि सातवीं शताब्दी में जब इस्लाम का उद्भव हुआ, तब मध्य-पूर्व में ईसाइयत पहले से मौजूद थी. लेकिन बाइबिल में मुहम्मद का ज़िक्र नहीं है—और इसके ऐतिहासिक कारण हैं.

आने वाली सदियों में इस्लाम ने ईसा को अपने धार्मिक ढांचे में जगह दी. लेकिन चर्च ने वैसी उदारता नहीं दिखाई. यूरोप की कला, चर्चों और साहित्य में कई बार मुस्लिम पैगंबर को अपमानजनक रूप में दिखाया गया. हालांकि आज चर्च आधिकारिक तौर पर ऐसी सोच का समर्थन नहीं करता.

एक लंबा समय गुज़र चुका है, लेकिन हमारे दौर में एक अलग तरह का तनाव, पूर्वाग्रह और चरमपंथी हिंसा मौजूद है. इसी वजह से आज यह समझना पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है कि मुसलमान ईसा को क्यों मानते हैं, लेकिन क्रिसमस क्यों नहीं मनाते.

(नोट प्रस्तुत आलेख में आये विचार लेखक के निजी हैं, इनका द उलगुलान डॉट इन से संबंध नहीं है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *