Ranchi
शहीद बुधू भगत विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित एक गरिमामय सेमिनार में प्रसिद्ध लेखिका डॉ शालिनी मिंज की दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। इन पुस्तकों के शीर्षक “झारखंड की खड़िया जनजाति: एक मानवशास्त्रीय अध्ययन” तथा “झारखंड की खड़िया जनजाति की कला संस्कृति” हैं। दोनों पुस्तकें खड़िया जनजातीय समाज, उसकी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित हैं और खड़िया समुदाय की भाषा-संवेदना को सामने लाने का महत्वपूर्ण प्रयास हैं।

सेमिनार में लगभग 200 से अधिक विद्वान, शोधार्थी, छात्र-छात्राएँ और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का वातावरण बौद्धिक विमर्श और सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत रहा।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो सत्यनारायण मुंडा ने कहा कि खड़िया जनजाति की भाषा, संस्कृति और परंपराओं पर किया गया यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि “ऐसे शोधपरक कार्य आदिवासी समाज की पहचान और इतिहास को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”
प्रख्यात विद्वान डॉ विजय शंकर सहाय ने अपने वक्तव्य में कहा कि खड़िया समाज की सांस्कृतिक विविधता को शैक्षणिक दृष्टि से प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने लेखिका के शोध को जनजातीय अध्ययन की दिशा में एक गंभीर प्रयास बताया।
वहीं डॉ अजीत कुमार सिन्हा ने कहा कि यह दोनों पुस्तकें न केवल मानवशास्त्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी।
डॉ विजय प्रकाश शर्मा ने कहा कि जनजातीय संस्कृति पर आधारित इस प्रकार के कार्य आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बनते हैं।
इस अवसर पर डॉ अरविन्द सिन्हा, डॉ अवधेश कुमार सिंह, डॉ नवल किशोर अंबष्ट तथा डॉ शैलेन्द्र प्रसाद सिन्हा ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि झारखंड की जनजातीय भाषाओं और संस्कृतियों पर गंभीर अध्ययन और प्रकाशन समाज के बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने लेखिका डॉ शालिनी मिंज को उनकी इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए बधाई दी और आशा व्यक्त की कि उनका यह कार्य झारखंड के जनजातीय अध्ययन और साहित्य को नई दिशा प्रदान करेगा।
