खाली जगह की गूंज में भीगे जज़्बात, शिबू सोरेन के बिना पहला स्थापना दिवस; मंच पर भावुक हुए CM हेमंत सोरेन

DUMKA

दुमका के मंच पर कल जो सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा था, वह कोई चेहरा नहीं था—वह थी एक खाली कुर्सी। वही खाली कुर्सी, जिसने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मंच पर भावुक कर दिया, उनकी आवाज भर्रा गई और शब्द साथ छोड़ने लगे। संबोधन के दौरान उन्होंने बस इतना कहा—“आज बाबा बहुत याद आ रहे हैं”—और इसके बाद पूरा पंडाल एक गहरे सन्नाटे और नम आंखों में डूब गया।

यह क्षण सिर्फ एक मुख्यमंत्री का नहीं था, बल्कि एक बेटे का अपने पिता की अनुपस्थिति से सामना करने का पल था। आंखें नम थीं, होंठ कांप रहे थे और मंच पर खड़ा शख्स अपने जज़्बातों को संभालने की पूरी कोशिश कर रहा था। दशकों तक जिस मंच की शोभा दिशोम गुरु शिबू सोरेन बने रहे, उसी मंच पर कल उनकी खाली जगह हर किसी को चुभ रही थी।

मौका था झारखंड मुक्ति मोर्चा के स्थापना दिवस का। दुमका में आयोजित यह कार्यक्रम कई मायनों में ऐतिहासिक था, क्योंकि यह पहला अवसर था जब दिशोम गुरु शिबू सोरेन के बिना दुमका में झामुमो का स्थापना दिवस मनाया गया। इसी वजह से मंच पर उनके लिए जानबूझकर एक कुर्सी खाली रखी गई थी। जिस सोफे पर मुख्यमंत्री बैठे थे, उसके ठीक बगल में वह खाली कुर्सी थी—और उस पर रखी थी दिशोम गुरु की तस्वीर।

यह खाली कुर्सी सिर्फ एक प्रतीक नहीं थी। यह उस शख्स की मौजूदगी का मौन एलान थी, जिनके बिना झामुमो और अलग झारखंड राज्य की कल्पना अधूरी मानी जाती है। मंच पर मौजूद हर व्यक्ति उस खालीपन को महसूस कर रहा था। दिशोम गुरु की अनुपस्थिति जैसे पूरे पंडाल में गूंज रही थी।

इस कार्यक्रम में दिशोम गुरु के दोनों बेटे—हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन—मौजूद थे। दोनों के चेहरों पर पिता की गैरमौजूदगी का दर्द साफ झलक रहा था। बरगद जैसी छाया देने वाले शिबू सोरेन पहली बार इस आयोजन में उनके साथ नहीं थे। मुख्यमंत्री अपने संबोधन के दौरान कई बार रुके, आंखें पोंछीं और भावनाओं को संभालने की कोशिश की।

खाली कुर्सी के मर्म को शब्द देते हुए झामुमो के वरिष्ठ नेता मिथिलेश ठाकुर ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन की छवि संघर्ष, स्वाभिमान और आदिवासी चेतना की अमिट पहचान है। उन्होंने कहा कि जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए गुरुजी का संघर्ष ही झारखंड की आत्मा है। भले ही वे देह रूप में आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार हर आंदोलन और हर संकल्प में जीवित हैं।

इस दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लोगों से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि जनता के समर्थन से ही यह आंदोलन और यह सरकार आगे बढ़ी है। उन्होंने लोगों से अपने अधिकारों के लिए जागरूक होने और बच्चों को अच्छी शिक्षा देने पर जोर दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियां राज्य को आगे बढ़ा सकें।

मुख्यमंत्री ने संथाली भाषा में लोगों को संबोधित करते हुए शिबू सोरेन को याद किया और कहा कि उन्होंने भारी संघर्ष के बाद झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाया। उन्होंने कहा कि “आज वह हमारे साथ नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें और उनके दिखाए रास्ते हमेशा हमारे साथ रहेंगे।”

दुमका के इस आयोजन में खाली कुर्सी और खाली जगह सिर्फ एक दृश्य नहीं थी, बल्कि एक ऐसा भाव था, जिसे झामुमो का हर कार्यकर्ता अपने भीतर महसूस कर रहा था—और जो लंबे समय तक लोगों के मानस में गूंजता रहेगा।

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