विश्व के सबसे बड़े पूंजीवादी देश अमेरिका में भी महिलाएं अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं

Amba Prasad

महिला दिवस (8 मार्च) पर खास

जिस उद्देश्य से महिला दिवस मनाया जाता है, वह उद्देश्य अभी पूरी तरह पूरा नहीं हुआ है। उसे पूरा होने में अभी समय लगेगा।

महिला सशक्तिकरण पर बहुत लोग बातें करते हैं, लेकिन सशक्तिकरण तब तक संभव नहीं है जब तक समाज में लिंग भेद बना रहेगा। कई देशों के संविधान में लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया है, लेकिन सामाजिक स्तर पर यह मानसिकता आज भी काफी हद तक मौजूद है।

एक सामान्य उदाहरण देखें। 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से करीब 77 वर्ष से अधिक समय बीत चुके हैं और हमारे संविधान की उम्र भी लगभग उतनी ही हो गई है। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री पद पर अब तक केवल एक ही महिला दिखाई देती हैं—इंदिरा गांधी। उनके अलावा सभी प्रधानमंत्री पुरुष ही रहे हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा, देश की सेना, नौसेना और वायुसेना के सर्वोच्च पदों पर भी आज तक किसी महिला को हमने नहीं देखा। रिज़र्व बैंक की गवर्नर के पद पर भी केवल एक बार महिला को अवसर मिला, बाकी अधिकतर पुरुष ही रहे हैं। राज्यों के राज्यपालों में भी कभी-कभार ही किसी महिला का नाम दिखाई देता है।

औसतन देखें तो हमारे देश में लगभग 90 प्रतिशत मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री पुरुष ही हैं। इसलिए महिला दिवस मनाने की वास्तविक खुशी और उसका औचित्य तब होगा, जब हमारे घरों में मौजूद लगभग 70 प्रतिशत घरेलू महिलाओं, यानी होममेकर और हाउसवाइफ, को उनके पति और परिवार द्वारा बराबर की अहमियत दी जाएगी।

अंबा ने कहा, यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, और विश्व के सबसे बड़े पूंजीवादी देश अमेरिका में भी महिलाएं अपने अस्तित्व और अधिकारों की तलाश कर रही हैं। वहां तलाक के मामले सबसे अधिक हैं, और शारीरिक उत्पीड़न की घटनाएं भी बड़ी संख्या में सामने आती हैं, जबकि उस देश की आर्थिक विकास दर हमसे कई गुना अधिक है। अगर हम आसपास के देशों पर नजर डालें, तो वहां भी महिलाओं की स्थिति लगभग ऐसी ही है, और कहीं-कहीं तो इससे भी ज्यादा चिंताजनक है।

(अंबा प्रसाद बड़कागांव, हजारीबाग की पूर्व विधायक हैं औऱ सामाजिक मुद्दों पर लिखती रहती हैं)

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