रांची सम्मेलन में महिलाओं ने जताई एकजुटता, अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष का संकल्प
Conference Highlights Gender Justice, Women Unite Against Control,
RANCHI
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य पर झारखंड जनाधिकार महासभा की ओर से रांची में “धर्म सत्ता, पितृ सत्ता और महिलाओं की आजादी” विषय पर एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के आयोजन में आदिवासी विमेंस नेटवर्क, कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन (बिहार-झारखंड-अंडमान), संभवा इंजोर, महिला मुक्ति संघर्ष (चतरा), शक्ति अभियान (झारखंड) तथा महिला उत्पीड़न विरोधी एवं विकास समिति समेत कई संगठनों की प्रमुख भूमिका रही। कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों, धर्मों और राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़ी सैकड़ों महिलाओं ने भाग लेकर अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
कार्यक्रम का संचालन अलका आईंद, लीना और रोज मधु तिर्की ने किया। सम्मेलन का आधार पत्र किरण ने प्रस्तुत किया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के क्रांतिकारी इतिहास को याद करते हुए कहा कि धर्म सत्ता, पितृ सत्ता और राज सत्ता मिलकर महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखने की कोशिश करती रही हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी शक्तियों के खिलाफ महिलाओं की एकजुटता और संघर्ष ही बदलाव का रास्ता तैयार कर सकता है।
सामाजिक कार्यकर्ता नीलम तिग्गा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि समाज में पुरुषों की सोच अब भी महिलाओं को घर तक सीमित रखने की रही है। वे चाहते हैं कि महिलाएं केवल घरेलू कामों में लगी रहें और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी सीमित हो। उन्होंने कहा कि कई धार्मिक संगठनों में निर्णय लेने का अधिकार केवल पुरुषों के पास होता है और महिलाओं पर उन निर्णयों को थोप दिया जाता है। कई जगह महिलाओं की भूमिका केवल स्वागत या औपचारिक कार्यों तक सीमित कर दी जाती है।
एपवा की नंदिता भट्टाचार्य ने कहा कि महिलाओं ने लंबे संघर्ष के बाद कई अधिकार हासिल किए हैं, लेकिन वर्तमान समय में देश की सत्ता इन अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में भी कई बार ऐसे फैसले सामने आते हैं जो महिलाओं के हितों के खिलाफ दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि “रातें और सड़कें हमारी हैं” और महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेंगी।
थेयोलॉजिकल कॉलेज से जुड़ी प्रोफेसर इदन टोपनो ने कहा कि लगभग सभी धर्मों की संरचना पितृसत्तात्मक रही है। इसलिए इन धार्मिक व्यवस्थाओं की आंतरिक समीक्षा जरूरी है कि महिलाओं को वास्तव में बराबरी का दर्जा दिया जा रहा है या उन्हें हाशिये पर रखा जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि झारखंड में आदिवासी महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना है। झारखंड अलग राज्य आंदोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी रही, लेकिन राज्य बनने के बाद सत्ता के विभिन्न केंद्रों में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि बड़े कॉरपोरेट घराने भी महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में महिलाओं को राजनीतिक शक्ति अपने हाथ में लेकर इन परिस्थितियों का मुकाबला करना होगा।
पश्चिम बंगाल से आई मनीषा ने कहा कि देश की आजादी के साथ ही महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला था, लेकिन आज यह अधिकार भी चुनौती के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में किए गए मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से हट गए, जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं।
शक्ति क्लब से जुड़ी निकी ने कहा कि धर्म के भीतर महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि वे सभी समुदायों की महिलाओं के साथ मिलकर अपने समुदाय के भीतर भी महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहती हैं।
महिला मुक्ति संघर्ष समिति, चतरा की संजू देवी ने कहा कि महिलाएं कई कामों में अग्रणी भूमिका निभाती हैं, लेकिन अक्सर उसका श्रेय पुरुषों को मिल जाता है। यह मानसिकता बदलने की आवश्यकता है।
आदिवासी जन परिषद की सेलीना लकड़ा ने कहा कि वे आदिवासी अधिकारों और जमीन से जुड़े कई आंदोलनों में सक्रिय रही हैं। लेकिन जब उन्होंने पार्षद चुनाव लड़ा, तब पुरुषों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उन्होंने कहा कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है।
पाकुड़ से आई मीना मुर्मू ने कहा कि समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। उन्होंने कहा कि वे लगातार ऐसे मामलों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन की रश्मि, प्रियशीला बेसरा और हीरामनी सहित अन्य महिलाओं ने गीत और कविताओं के माध्यम से भी अपनी बात रखी और महिलाओं के अधिकारों तथा समानता के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
आलम आरा ने कहा कि विभिन्न धर्मों के पुरुष नेतृत्व अक्सर लोगों को आपस में लड़ाने का काम करते हैं, जबकि हर धर्म की महिलाओं की समस्याएं लगभग समान हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं का शोषण भी समान है और इसके खिलाफ उनकी लड़ाई भी साझा है।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि वे समानता, सम्मान और आजादी के लिए संघर्ष जारी रखेंगी। साथ ही धर्म सत्ता, पितृसत्ता और राज सत्ता द्वारा महिलाओं पर नियंत्रण स्थापित करने के हर प्रयास का विरोध किया जाएगा।
इस सम्मेलन में अशिष्ण बागे, अमल पांडेय, एलिना होरो, बिल्कन डांग, रॉयल डांग, कुमुद, सिराज, टॉम कावला, भरत भूषण चौधरी, माला, नसरीन जमाल, श्रीनिवास, मंथन, सुधांशु शेखर, उत्तम, प्रवीर पीटर, आकांक्षा, मनोज, रोज खाखा समेत कई अन्य लोग भी उपस्थित रहे।
