रांची में ‘जेंडर और क्लाइमेट चेंज’ पर कला का प्रतिरोध, 19 महिला कलाकारों की प्रदर्शनी


ऑड्रे हाउस में रंगों के जरिए जलवायु संकट और लैंगिक न्याय पर गूंजा संवाद



Ranchi


रोहिणी नीलकणी फिलांथ्रोपीज़ के सहयोग से सीएमएस वातावरण (CMS VATAVARAN) द्वारा 12 और 13 फरवरी 2026 को ऑड्रे हाउस, रांची में ‘एनवायरनमेंटल ट्रैवलिंग फिल्म फेस्टिवल’ आयोजित किया जा रहा है। इसी महोत्सव के तहत ‘देशज अभिक्रम’ और ‘असर’ के संयुक्त तत्वावधान में “जेंडर और क्लाइमेट चेंज” विषय पर महिला कलाकारों की विशेष पेंटिंग प्रदर्शनी लगाई गई है।

इस प्रदर्शनी में झारखंड की 19 युवा महिला कलाकारों—दिव्याश्री, अनुकृति टोप्पो, सस्मि रेखा पात्र, अर्पिता राज नीरद, सुधा कुमारी, निशी कुमारी, सृजिता, रोशनी खलखो, मनिता कुमारी उरांव, ज्योति वंदना लकड़ा, मानसी टोप्पो, रितेश्ना राज, चांदनी कुमारी, काराबी दास, सोफिया मिंज, तान्या मिंज, नीलम नीरद, रंजीता सिंह और पिंकी कुमारी—की कृतियाँ शामिल हैं।

प्रदर्शनी कला को केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे संवाद और प्रतिरोध का माध्यम बनाती है। कलाकारों ने जंगलों की कटाई, खनन, विस्थापन, बाढ़-सूखे और औद्योगीकरण के प्रभावों के साथ-साथ महिलाओं के रोजमर्रा के संघर्ष को कैनवास पर उकेरा है। कई चित्रों में स्त्री और प्रकृति के रिश्ते को गहराई से दर्शाया गया है—कहीं उम्मीद की हरियाली है तो कहीं बदलते मौसम की त्रासदी।

कुछ कृतियाँ वर्षा जल संग्रहण और इको-फ्रेंडली आवास जैसे समाधानों की ओर इशारा करती हैं, जबकि अन्य अनियंत्रित विकास के दुष्परिणामों को सामने लाती हैं। प्रदर्शनी का साझा संदेश है कि जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और लैंगिक चुनौती भी है।

इसी क्रम में चित्रकार शेखर की श्रृंखला “सिम्फ़नी इन ब्लैक” भी आकर्षण का केंद्र है। श्वेत-श्याम रंगों में रची गई इस श्रृंखला में अमूर्त और प्रतीकात्मक शैली के जरिए पर्यावरणीय संकट और मानवीय तनाव को अभिव्यक्त किया गया है। “सिम्फ़नी इन ब्लैक-1” में मानव चेहरा और प्रतीकात्मक रेखाएँ प्रकृति और मनुष्य के जटिल संबंध को दर्शाती हैं। “सिम्फ़नी इन ब्लैक-2” विस्थापन और अस्थिरता की अनुभूति कराता है, जबकि “सिम्फ़नी इन ब्लैक-3” में आधा डूबा सूर्य और सूखे पेड़ जलवायु संकट की गंभीर चेतावनी देते नजर आते हैं।

यह प्रदर्शनी दर्शकों को केवल संकट से अवगत नहीं कराती, बल्कि समाधान, संवेदना और साझा जिम्मेदारी की दिशा में सोचने को प्रेरित करती है। कला के जरिए यह संदेश दिया गया कि प्रकृति और स्त्री की पहचान की रक्षा किए बिना किसी न्यायपूर्ण भविष्य की कल्पना अधूरी है।

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