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भारत–अमेरिका ट्रेड डील आज रात 12 बजे से लागू हो जायेगी। टीवी और अखबारों में इसकी खूब तारीफ हो रही है। बताया जा रहा है कि यह बड़ी कूटनीतिक जीत है। लेकिन असली सवाल यह है कि यह डील है क्या, और इसका असर किस पर पड़ेगा?
सरकार की तरफ से साफ जानकारी अभी नहीं आई है। प्रधानमंत्री चुप हैं। वाणिज्य और कृषि मंत्री के बयान भी बहुत स्पष्ट नहीं हैं। भारत–पाक युद्धविराम की तरह इस बार भी डील की पहली खबर भारत की जनता को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से ही मिली। ट्रंप ने साफ कहा कि इस समझौते में कृषि शामिल है। अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस ने तो अपने किसानों को बधाई देते हुए कहा कि अब उनकी फसलों के लिए भारत का बाजार खुल गया है।
यह बात इसलिए अहम है क्योंकि पिछले कई दशकों से भारत की नीति रही है कि कृषि को बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से बाहर रखा जाए। तर्क यह रहा कि हमारे किसान छोटे हैं, उनकी लागत ज्यादा है और वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे। खुद प्रधानमंत्री ने कुछ महीने पहले कहा था कि किसान, पशुपालक और मछुआरे उनकी प्राथमिकता हैं और उनके हितों से समझौता नहीं होगा।
अब सरकार कह रही है कि समझौते के प्रावधान अभी पूरी तरह तय नहीं हुए हैं। इसलिए यह साफ नहीं है कि भारत ने कौन-कौन सी शर्तें मानी हैं। लेकिन इतना तो साफ है कि कृषि को पूरी तरह बाहर रखने का जो रुख था, उससे सरकार पीछे हटी है।
इसका असर क्या होगा? माना जा रहा है कि बादाम, पिस्ता और सेब जैसे उत्पादों का आयात बड़े पैमाने पर बढ़ सकता है। इन फसलों से जुड़े किसानों को सीधा झटका लग सकता है।
सबसे ज्यादा चिंता मक्का, सोयाबीन और गन्ना किसानों को लेकर है। पिछले कुछ सालों में देश में मक्का और सोयाबीन का उत्पादन बढ़ा है। किसानों को इनका दाम भी ठीक-ठाक मिल रहा था। अगर अमेरिका से सस्ता मक्का और सोयाबीन आने लगा, तो भारतीय बाजार में कीमतें गिर सकती हैं। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा।
कपास का मामला थोड़ा अलग है। पिछले कुछ वर्षों से कपास का उत्पादन कम हुआ है और हमें आयात करना पड़ता है, इसलिए वहां असर कम दिख सकता है। लेकिन गन्ना किसान पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि कृषि बाजार आपस में जुड़े होते हैं। एक फसल की कीमत गिरती है तो उसका असर दूसरी फसलों पर भी पड़ता है।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि डील हुई या नहीं। असली सवाल यह है कि इसका बोझ कौन उठाएगा। अगर बाजार खुलता है, तो क्या भारतीय किसानों को बराबरी की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया गया है? या फिर यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया है?
तस्वीर अभी पूरी साफ नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि यह समझौता सिर्फ कूटनीति की खबर नहीं है, यह खेत और मंडी की भी खबर है। और उसका असर सबसे पहले जमीन पर ही दिखेगा।
