कैसा गण और कैसा तंत्र?

झारखंड के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में  ये आलेख डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’ ने भेजा है। बीरेन्द्र महतो को मैं दो दशक से जानता हूं। मुद्दों के प्रति इतनी निष्ठा और समर्पण मिलना, वो भी इतनी सादगी के साथ आज कठिन है- संपादक  

गणतंत्र का अर्थ केवल सत्ता का लोकतांत्रिक हस्तांतरण नहीं, बल्कि जनता की सक्रिय भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और शासन व्यवस्था की जवाबदेही है। गण यानी जनता और तंत्र यानी व्यवस्था, इन दोनों के संतुलन से ही गणतंत्र जीवंत रहता है। झारखंड के संदर्भ में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यहाँ गण वास्तव में निर्णायक भूमिका में है, या तंत्र अपनी सुविधा के अनुसार गण को हाशिये पर धकेलता जा रहा है।

झारखंड आदिवासी-मूलवासी समाज, लोक जीवन और सहअस्तित्व की परंपरा पर खड़ा राज्य है। यहाँ की ग्रामसभा, मांदर–नगाड़े की थाप, सरहुल, करम, सोहराय जैसे पर्व और सामूहिक श्रम-संस्कृति लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करती हैं। संविधान की पाँचवीं अनुसूची, पेसा कानून (1996) और वनाधिकार कानून (2006) इसी भावना से बने थे कि आदिवासी क्षेत्रों में निर्णय का अधिकार नीचे से ऊपर जाए। लेकिन व्यवहार में स्थिति अलग दिखाई देती है।

पेसा कानून ग्रामसभा को जल, जंगल और ज़मीन से जुड़े निर्णयों में सर्वोच्च मानता है। इसके बावजूद झारखंड में कई खनन और औद्योगिक परियोजनाओं में ग्रामसभा की सहमति को औपचारिकता में बदल दिया गया। कहीं हस्ताक्षर जुटाए गए, कहीं बैठकों की सूचना ठीक से नहीं दी गई। परिणाम यह हुआ कि जिन लोगों की जमीन गई, उन्हें न तो समय पर मुआवज़ा मिला और न ही स्थायी रोज़गार। यह उदाहरण बताता है कि कानून मौजूद है, पर तंत्र की नीयत और क्रियान्वयन कमजोर है।

वनाधिकार कानून का उद्देश्य था कि पीढ़ियों से जंगल पर आश्रित समुदायों को व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार मिलें। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि बड़ी संख्या में दावे आज भी लंबित हैं या निरस्त कर दिए गए हैं। जिन गाँवों को सामुदायिक वनाधिकार मिलना चाहिए था, वहाँ वन प्रबंधन अब भी बाहरी नियंत्रण में है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या तंत्र आदिवासी समाज को संरक्षक मानता है या केवल नियंत्रित करने योग्य समूह?

शिक्षा और भाषा का प्रश्न भी गण और तंत्र के टकराव को उजागर करता है। झारखंड की अधिकांश आबादी आदिवासी और मूलवासी भाषाओं में सोचती-बोलती है। संताली, मुंडारी, हो, कुँड़ुख, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली, पंचपरगनिया जैसी भाषाएँ यहाँ की आत्मा हैं। इसके बावजूद प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा आधारित शिक्षा आज भी सीमित है। नतीजा यह कि बच्चे स्कूल तो जाते हैं, पर सीखने की प्रक्रिया से जुड़ नहीं पाते। जब शिक्षा तंत्र लोक जीवन से कट जाता है, तब गण का भविष्य कमजोर होता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था भी इसी संकट से गुजर रही है। दूर-दराज़ के आदिवासी इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और पोषण संबंधी समस्याएँ आम हैं। योजनाएँ काग़ज़ पर सफल दिखती हैं, पर ज़मीनी सच्चाई अलग है। यह तंत्र की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है, जीवन नहीं।

लोक जीवन हमें सहअस्तित्व और संतुलन का पाठ पढ़ाता है। आदिवासी समाज में जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन साथी है। नदी केवल पानी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धारा है। पहाड़ केवल खनिज नहीं, बल्कि पुरखों की स्मृति है। इसके विपरीत, विकास की मौजूदा परिभाषा अक्सर केवल खनन, उद्योग और राजस्व तक सीमित रह जाती है। जब विकास का मॉडल स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण को नज़रअंदाज़ करता है, तब संघर्ष स्वाभाविक है।

झारखंड में बेरोज़गारी और पलायन भी गणतंत्र की सेहत पर सवाल उठाते हैं। खनिज संपदा से भरपूर होने के बावजूद यहाँ के युवाओं को रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस भूमि से देश को संसाधन मिलते हैं, उसी भूमि के लोग रोज़गार से वंचित रहते हैं? यह तंत्र की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न है।

गणतंत्र दिवस पर आत्ममंथन केवल सरकार का दायित्व नहीं, समाज का भी है। सवाल यह है कि क्या हम केवल लाभार्थी बनकर रह गए हैं, या अधिकारों के प्रति सजग नागरिक भी हैं? ग्रामसभा को मजबूत करना, स्थानीय नेतृत्व को ईमानदार बनाना और लोक संस्कृति को केवल मंचीय प्रदर्शन तक सीमित न रखना, यह सब गण की जिम्मेदारी भी है।

सच्चा गणतंत्र वही है जहाँ तंत्र आदेश नहीं, संवाद करे, जहाँ नीति बनाते समय लोक जीवन की समझ हो और जहाँ विकास का मतलब सम्मान, सुरक्षा और सहभागिता हो।

झारखंड को ऐसे गण की जरूरत है जो सवाल पूछे और ऐसे तंत्र की जरूरत है जो जवाब देने का साहस रखे। तभी गणतंत्र यहाँ उत्सव नहीं, जीवन बन सकेगा।

डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’, सहायक प्राध्यापक

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय, रांची विश्वविद्यालय, रांची।

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