रांची विश्वविद्यालय में नीड बेस्ड शिक्षकों के मानदेय में भारी असमानता का आरोप

टीआरएल संकाय के सात भाषा विभागों के शिक्षक सर्वाधिक प्रभावित

स्वीकृत 57,700 के बजाय 20 से 45 हजार तक ही भुगतान, समानता की मांग तेज

RANCHI

रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत कार्यरत नीड बेस्ड शिक्षकों के मानदेय भुगतान में गंभीर असमानता का आरोप लगा है। विशेष रूप से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) संकाय के सात भाषा विभागों में कार्यरत शिक्षक इस व्यवस्था से सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, जब नीड बेस्ड शिक्षकों के लिए पूर्व में 36 हजार रुपये मानदेय निर्धारित था, तब भी संबंधित शिक्षकों का बिल कभी 16 हजार से 25 हजार रुपये के बीच ही बनाया जाता था। आश्चर्यजनक रूप से वर्तमान में जब मानदेय बढ़ाकर 57,700 रुपये कर दिया गया है, तब भी इन शिक्षकों को 20 हजार से 45 हजार रुपये के बीच ही भुगतान किया जा रहा है।

यह स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब विश्वविद्यालय के अन्य कॉलेजों और विभागों में कार्यरत नीड बेस्ड शिक्षकों को निर्धारित 57,700 रुपये का पूरा मानदेय नियमित रूप से दिया जा रहा है। एक ही विश्वविद्यालय के अंतर्गत कार्यरत शिक्षकों के बीच इस प्रकार की आर्थिक असमानता न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि शिक्षकों के मनोबल और शैक्षणिक वातावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

गौरतलब है कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी निर्देश के अनुसार नीड बेस्ड शिक्षकों के लिए प्रति माह 64 कक्षाओं का प्रावधान किया गया है, जिसमें गैर-शैक्षणिक कार्य भी शामिल माना गया है। इस संबंध में विश्वविद्यालय द्वारा अधिसूचना भी जारी की गई थी। किंतु व्यवहारिक स्तर पर स्थिति अलग दिखाई देती है। कई विभागाध्यक्षों का कहना है कि उनके विभागों में गैर-शैक्षणिक कार्य की कोई स्पष्ट व्यवस्था या आवश्यकता ही नहीं है, ऐसे में उस आधार पर कक्षाओं या कार्य का निर्धारण करना भी कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप शिक्षकों के मानदेय का बिल अक्सर कम राशि का बना दिया जाता है।

टीआरएल संकाय के भाषा विभागों के शिक्षक लंबे समय से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, परंतु अब तक कोई ठोस और न्यायपूर्ण समाधान सामने नहीं आ पाया है। शिक्षकों का कहना है कि समान कार्य करने के बावजूद अलग-अलग भुगतान किया जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

शिक्षाविदों का मानना है कि यदि विश्वविद्यालय के भीतर ही समान कार्य के लिए असमान भुगतान की स्थिति बनी रहती है, तो यह न केवल शिक्षकों के अधिकारों का हनन है, बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।

ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले पर गंभीरता से विचार करे और स्पष्ट एवं पारदर्शी नीति के तहत सभी नीड बेस्ड शिक्षकों को समान मानदेय सुनिश्चित करे। साथ ही राज्य के संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग को भी इस विषय पर संज्ञान लेते हुए आवश्यक हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि शिक्षकों के साथ हो रही यह असमानता समाप्त हो सके और विश्वविद्यालय परिसर में न्यायसंगत शैक्षणिक वातावरण स्थापित हो सके।

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