200 साल पुरानी परंपरा पर रोक, दिल्ली में ‘फूलवालों की सैर’ को नहीं मिली मंजूरी; इस वर्ष नहीं मनाया जायेगा हिंदू-मुस्लिम एकता का त्योहार

5th November 2025


New Delhi
दिल्ली की गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक माने जाने वाले ऐतिहासिक उत्सव ‘फूलवालों की सैर’ पर इस बार रोक लग गई है। दो सौ साल पुरानी यह परंपरा प्रशासनिक अनुमति के अभाव में नहीं हो सकी। आयोजन समिति ने बताया कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की ओर से मेहरौली के आम बाग में कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी गई, जिसके चलते उन्हें इस वर्ष समारोह रद्द करना पड़ा।

अंजुमन सैर-ए-गुल फरोशान, जो इस आयोजन की मुख्य समिति है, का कहना है कि अनुमति प्रक्रिया डीडीए और वन विभाग के बीच फंस गई। दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे और तय समय पर अनुमति नहीं मिली। समिति के प्रतिनिधियों ने कहा कि जब कोई रास्ता नहीं बचा तो उन्हें इस वर्ष यह आयोजन स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा।

‘फूलवालों की सैर’ का इतिहास दिल्ली की सांप्रदायिक एकता और मेल-जोल का प्रतीक रहा है। इसकी शुरुआत 1812 में मुगल बादशाह अकबर शाह द्वितीय के दौर में हुई थी। परंपरा के अनुसार, हिंदू और मुस्लिम समुदाय मिलकर योगमाया मंदिर और ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर क्रमशः फूलों के पंखे और चादर चढ़ाते हैं। तीन दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में शहनाई, कव्वाली, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रौनक रहती है।

अंग्रेज़ों ने इसे 1942 में बंद कर दिया था, लेकिन केंद्र सरकार के सहयोग से 1962 में यह फिर शुरू हुआ और तब से हर साल मेहरौली में आयोजित होता रहा है।

इस बार कार्यक्रम न हो पाने से स्थानीय लोगों और आयोजन समिति में निराशा है, क्योंकि यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि दिल्ली की साझा संस्कृति की झलक माना जाता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया
मामले पर राजनीति भी गरमा गई है। आम आदमी पार्टी ने इसे सांप्रदायिक सौहार्द पर हमला बताया है। पार्टी के दिल्ली संयोजक और पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने एक्स पर लिखा —

“दिल्ली में सदियों से चल रहे धार्मिक सौहार्द के त्योहार ‘फूलवालों की सैर’ को इस वर्ष से बंद किया जा रहा है। अंग्रेजों ने इसे 1942 में रोक दिया था, अब भाजपा सरकार ने इसे बंद कर दिया है। यह त्योहार हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है, जहां मंदिर और दरगाह दोनों पर फूल चढ़ाए जाते हैं।”

आम लोगों का कहना है कि यह उत्सव दिल्ली की पहचान रहा है — जहाँ फूलों की महक से नफरत की दीवारें पिघलती थीं। इस बार उस परंपरा पर प्रशासनिक चुप्पी ने निराश किया है।

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