हजारीबाग में सरहुल की गूंज, कुड़मी समाज ने कहा- प्रकृति का पर्व सभी का है

Hazaribagh

झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति से गहरे जुड़ाव का प्रतीक सरहुल पर्व इस वर्ष हजारीबाग जिले के चारी क्षेत्र में एक नए सामाजिक आयाम के साथ मनाया गया। यहां कुड़मी समाज के लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सरहुल उत्सव का आयोजन किया और स्वयं को आदिवासी समाज का हिस्सा बताते हुए अपनी पहचान को लेकर आवाज उठाई।

उत्सव के दौरान कुड़मी समाज के लोगों ने माथे पर पत्तों से बने मुकुट धारण किए, हाथों में पारंपरिक पत्ते लिए और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए पूरे उत्साह के साथ पर्व मनाया। आयोजन में शामिल नेताओं का कहना था कि सरहुल जैसे प्रकृति आधारित पर्व केवल आदिवासी समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भी इन परंपराओं से जुड़े हुए हैं और उन्हें अपनाने का अधिकार रखते हैं। साथ ही, उन्होंने झारखंड सरकार से आदिवासी समाज में शामिल किए जाने की मांग भी दोहराई।

झारखंड में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व प्रकृति पूजा का एक महत्वपूर्ण उत्सव है, जिसे मुख्य रूप से वसंत ऋतु में मनाया जाता है। यह पर्व साल वृक्ष (सखुआ) की पूजा और धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है। आदिवासी समाज में इसे नए वर्ष और नई फसल के आगमन के रूप में भी देखा जाता है।

इस पर्व की एक विशेष परंपरा मौसम के पूर्वानुमान से जुड़ी है। ‘सरगुन’ के रूप में एक घड़े में पानी भरकर रखा जाता है। यदि कुछ समय बाद पानी सूख जाता है, तो इसे आने वाले दिनों में कम वर्षा या सूखे का संकेत माना जाता है। वहीं, यदि पानी जस का तस बना रहता है, तो अच्छी वर्षा और समृद्ध फसल की उम्मीद की जाती है। इसी आधार पर ग्रामीण अपने कृषि कार्यों की योजना बनाते हैं।

हजारीबाग में कुड़मी समाज द्वारा सरहुल पर्व मनाया जाना न केवल सांस्कृतिक समावेशिता का संकेत है, बल्कि यह पहचान और अधिकार से जुड़े एक बड़े सामाजिक विमर्श को भी जन्म दे रहा है। इस आयोजन के माध्यम से समाज के लोगों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि प्रकृति से जुड़ी परंपराएं सभी की साझी धरोहर हैं।

स्थानीय स्तर पर इस पहल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर सामाजिक और सरकारी स्तर पर क्या रुख अपनाया जाता है।

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