अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर नीतिशा खलखो की कविता- देह से परे
NITISHA KHAKHO सजाने से ज़्यादा अब ख़ुद को समेटने की कला सीखनी है मेरे अस्तित्व को। देह भर तक ही…
NITISHA KHAKHO सजाने से ज़्यादा अब ख़ुद को समेटने की कला सीखनी है मेरे अस्तित्व को। देह भर तक ही…
लालदीप हमारे समय के बेहद सजग कवि है। लीक से अलग हटकर उनकी कविताएं हमेशा से ध्यान से खींचती…
हान कांगा अगर एक दिन नियति मुझसे बात करेमुझसे पूछेमैं तुम्हारी नियति हूंपता नहीं तुम्हारे मन में मेरे प्रतिगिला-शिकवा हैया…