यूजी और पीजी के छात्र बिना शिक्षक के पढ़ाई करने को मजबूर, पहले भी डोरंडा कॉलेज में चौथे शिक्षक की नियुक्ति हो चुकी
RANCHI
रांची विश्वविद्यालय में नागपुरी भाषा की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कोर्ट के आदेश और जेपीएससी की अनुशंसा के बाद पीजी नागपुरी विभाग में डॉ. मनोज कुमार कच्छप ने योगदान दे दिया है। उल्लेखनीय है कि असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए आवेदन करने वाले सभी अभ्यर्थियों में सर्वाधिक एकेडमिक प्वाइंट प्राप्त करने के बावजूद डॉ. कच्छप को अपनी नियुक्ति के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। अंततः न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद जेपीएससी ने रांची विश्वविद्यालय में उनकी नियुक्ति की अनुशंसा की।
हालांकि अनुशंसा के बाद भी यह नियुक्ति प्रस्ताव कई महीनों तक विश्वविद्यालय के सिंडिकेट से स्वीकृति की प्रतीक्षा में लंबित रहा। अब जाकर उन्होंने पीजी नागपुरी विभाग में योगदान दिया है।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। सिमडेगा कॉलेज और मांडर कॉलेज जैसे संस्थानों में नागपुरी विषय के लिए एक भी स्थायी या नीड बेस्ड शिक्षक उपलब्ध नहीं है। वहां स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के छात्र बिना शिक्षक के ही पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने नियुक्ति वहां कर दी, जहां पहले से ही तीन शिक्षक कार्यरत हैं। शिक्षा जगत के लोगों का कहना है कि यह निर्णय न केवल प्रशासनिक असंतुलन को दर्शाता है, बल्कि नागपुरी भाषा और उससे जुड़े छात्रों के भविष्य के साथ भी अन्याय है।
गौरतलब है कि इससे पूर्व भी डोरंडा कॉलेज में तीन शिक्षकों के रहते चौथे शिक्षक के रूप में योगेश कुमार महतो की नियुक्ति कर दी गई थी, जबकि उस समय भी सिमडेगा और मांडर कॉलेज में नागपुरी विषय के लिए एक भी स्थायी या नीड बेस्ड शिक्षक नहीं था।
बार-बार वही स्थिति दोहराए जाने से यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जिन कॉलेजों में नागपुरी विषय की पढ़ाई पूरी तरह शिक्षक विहीन है, वहां नियुक्ति को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही है?
स्थानीय शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों का कहना है कि यह स्थिति नागपुरी भाषा के विकास के लिए भी घातक है। एक ओर सरकार और विश्वविद्यालय क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर जिन कॉलेजों में छात्र शिक्षक के अभाव में जूझ रहे हैं, वहां कोई ठोस पहल नहीं की जा रही।
सिमडेगा और मांडर कॉलेज के छात्र लंबे समय से शिक्षक की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज अब तक अनसुनी बनी हुई है। ऐसे में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग से अपेक्षा है कि वे इस मामले का गंभीर संज्ञान लें और जिन कॉलेजों में नागपुरी विषय के छात्र बिना शिक्षक के पढ़ाई कर रहे हैं, वहां शीघ्र शिक्षक की नियुक्ति सुनिश्चित करें।
शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस विसंगति को दूर नहीं किया गया, तो यह न केवल छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय होगा बल्कि झारखंड की समृद्ध नागपुरी भाषा और उसकी अकादमिक परंपरा को भी गहरी क्षति पहुंचेगी।
