5 फरवरी, जयंती पर विशेष: लाल रणविजय नाथ शाहदेव, जो झारखंड को ‘राज्य’ नहीं, पहचान मानते थे

डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’

आज का युवा जब ‘झारखंड’ सुनता है, तो अक्सर यह एक सरकारी नक़्शा बनकर रह जाता है – फाइलें, योजनाएँ, चुनाव और घोषणाएँ। लेकिन झारखंड इससे कहीं ज़्यादा है। झारखंड एक सवाल है, एक स्मृति है, और सबसे बढ़कर एक संघर्ष है। इस संघर्ष को विचार और दिशा देने वाले लोगों में लाल रणविजय नाथ शाहदेव का नाम आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना राज्य गठन से पहले था। वे नेता कम और विचार ज़्यादा थे। ऐसे विचारक, जिन्होंने यह साफ कहा कि “झारखंड कोई एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आंदोलन है।”

एक शपथ, जिसने ज़िंदगी की दिशा बदल दी

1952 में खरसावाँ शहीद स्थल पर खड़े एक किशोर ने यह तय किया कि झारखंडियों की लड़ाई कोई और नहीं लड़ेगा, उन्हें खुद खड़ा होना होगा। यह कोई भावुक क्षण नहीं था, बल्कि आगे चलकर एक राजनीतिक दर्शन बना। राजनीति शास्त्र, इतिहास और क़ानून की पढ़ाई ने उनके आंदोलन को नारे नहीं, तर्क दिए। यही वजह थी कि वे सड़क पर भी उतने ही मज़बूत थे, जितने संसद की बहसों और मंत्रालयों की बैठकों में।

नेता नहीं, सिस्टम को चुनौती देने वाला दिमाग

1960–70 के दशक में जब समझौते और विलय को “राजनीतिक समझदारी” कहा जा रहा था, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव ने झारखंड पार्टी के कांग्रेस में विलय का खुला विरोध किया। उनके लिए यह सत्ता का नहीं, अस्मिता का सवाल था। आपातकाल हो या जे.पी. आंदोलन, जेल जाना उनके लिए दुर्घटना नहीं, चुना हुआ रास्ता था। वे मानते थे कि अगर राजनीति आरामदेह हो जाए, तो वह जनता से कट जाती है।

‘वनांचल’ बनाम ‘झारखंड’ : नाम की लड़ाई असल में विचार की लड़ाई थी

आज शायद यह बहस पुरानी लगे, लेकिन उस समय यह सवाल बेहद अहम था – राज्य का नाम क्या होगा?

जब “वनांचल” जैसे विकल्प सामने आए, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव ने साफ कहा कि “जंगल भूगोल है, झारखंड इतिहास है।”

उनके लिए ‘झारखंड’ कोई भावनात्मक टैग नहीं था, बल्कि संघर्ष की स्मृति, आदिवासी-मूलवासी साझा विरासत एवं भाषा, लोक और बलिदान का प्रतीक।

वे न तो झारखंड को केवल “आदिवासी राज्य” तक सीमित करते थे, न ही उसे बहुसंख्यक राजनीति में घुलने देते थे। उनका नजरिया आज के युवाओं के लिए बेहद प्रासंगिक है – समावेशी, लेकिन रीढ़ वाला।

जब कविता हथियार बन जाए

लाल रणविजय नाथ शाहदेव की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे भाषण और कविता के बीच दीवार नहीं खड़ी करते थे। उनकी नागपुरी कविताएँ सीधे कहती हैं –

स्वतंत्रता भीख में नहीं मिलती,

वह लाल लहू की धार से निकलती है।

करीब 400 गीत-कविताएँ, नाटक और निबंध, इन सबमें एक बात कॉमन है – ‘जनता बोल रही है।’

उनके गीत आकाशवाणी तक पहुँचे, लेकिन ज़मीन से कटे नहीं। यही वजह है कि उनका साहित्य ‘क्लासरूम’ से ज़्यादा ‘चौपाल’ में ज़िंदा है।

आज के युवाओं के लिए वे क्यों ज़रूरी हैं?

क्योंकि वे हमें यह सिखाते हैं कि पहचान का मतलब दूसरों को बाहर करना नहीं होता राजनीति बिना संस्कृति खोखली हो जाती है और साहित्य अगर सवाल न पूछे, तो वह सजावट बनकर रह जाता है

आज जब झारखंड में बेरोज़गारी, विस्थापन और संसाधनों की लूट पर सवाल उठ रहे हैं, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव के विचार हमें आईना दिखाते हैं।

एक विरासत, जो अभी पूरी नहीं हुई

18 मार्च 2019 को उनका जाना एक शरीर का अंत था, विचार का नहीं।

उनकी सबसे बड़ी सीख शायद यही है – “राज्य मिल जाना मंज़िल नहीं है, राज्य को न्यायपूर्ण बनाना असली संघर्ष है।”

लाल रणविजय नाथ शाहदेव को याद करना कोई औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह पूछना है कि क्या हम झारखंड को वही बना पा रहे हैं, जिसका सपना उन्होंने देखा था? अगर यह सवाल आज के युवा के मन में बेचैनी पैदा करे, तो समझिए, लाल रणविजय नाथ शाहदेव अब भी ज़िंदा हैं।

(डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’, सहायक प्राध्यापक, विश्वविद्यालय नागपुरी विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची, झारखंड)

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