खिराज़-ए-अक़ीदत: वह चिराग़ जो बुझकर भी रौशनी दे गया


ख़लील अहमद की तीसरी बरसी पर खास


Mohammad Salauddin

“उठा जो अज़्म लेकर वो ज़माने को बता डाला,
अंधेरी बस्तियों में इल्म का आफ़ताब उगा डाला।

वो रूह-ए-अ़सर था, ज़ुल्मत के सीने में धड़कता था,
ग़रीबों की दुआ बन कर वो आँखों में चमकता था।

वो ‘ख़लील’ था, जिसकी दोस्ती का ज़र्फ़ तो देखो,
मुसाफ़िर बन के आया और रस्ता ही बदल डाला।

न था वो नाम का भूखा, न वो शोहरत का शैदाई,
क़लम को ढाल बनाया और जिहालत को मिटा डाला।

कहाँ वो ज़ोर-ए-बाज़ू, वो लहू की सुर्खी अब कहाँ,
कि जिसने झोंपड़ों में तालीम का परचम सजा डाला।

गया जो बाग़ से वो बाग़बां, कलियाँ ये रोती हैं,
कि जिसने अपनी साँसों से हर इक गुल को खिला डाला।”

तारीख़ के पन्ने पलटते हैं, साल बीत जाते हैं, मगर कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं जो वक़्त की धूल से धुंधले नहीं होते। आज 28 फरवरी है—वही दिन जब तीन साल पहले राँची के इस्लामनगर की फिज़ाओं ने अपना सबसे लाडला बेटा खो दिया था। मरहूम ख़लील अहमद साहब की तीसरी बरसी पर आज दिल फिर उसी मुक़ाम पर खड़ा है, जहाँ दर्द और यादों का सैलाब थमने का नाम नहीं लेता।

“बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई,
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया।”

वह दरवेश, जिसने तालीम को इबादत बना दिया था। ख़लील साहब महज़ एक इंसान नहीं, एक मुक़म्मल तहरीक़ थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का हर लम्हा उस तबके के नाम कर दिया था जिसे समाज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।

“अपनी खुशियाँ लुटा कर ग़म-ए-इंसान ख़रीदा,
उसने एक पल में सदियों का सामान ख़रीदा।”

वह चेहरा, जो उम्मीद का इस्तआरा था अक्सर शाम के धुंधले में जब बस्तियों के बच्चे हाथ में किताबें लिए घर लौटते हैं, तो गुमान होता है कि कहीं कोने में खड़े ख़लील साहब मुस्कुरा रहे होंगे। उनकी वह शफ़क़त भरी मुस्कुराहट, जिसमें थके हुए लोगों के लिए सुकून था और भटकते हुए नौजवानों के लिए एक राह।

“न जाने कौन सी मिट्टी की आबो-ताब थी उनमें,
कि जिनके जाने से बस्तियाँ भी बेनूर हो गईं।”

उनका मिशन सिर्फ बच्चों को स्कूल भेजना नहीं था, बल्कि उन मासूम आँखों में ‘ख्वाब’ बोना था। इस्लामनगर और राँची के दीगर पिछड़े इलाकों में जो ‘मोहल्ला तालीमी सेंटर’ और ‘होमवर्क सेंटर’ उन्होंने कायम किए थे, वे महज़ ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं हैं, बल्कि खलील साहब की उस तड़प का सुबूत हैं जो वह समाज के पिछड़ेपन को देखकर महसूस करते थे। वह अक्सर कहते थे कि “अगर एक बच्चा भी तालीम से महरूम रह गया, तो हमारा मिशन अधूरा है।”

ख़लील: जिसका वजूद ही ‘मोहब्बत’ था। इंसान अपने नाम के असर से पहचाना जाता है। ‘ख़लील’ का मतलब होता है ‘दोस्त’, और वह वाक़ई पूरी इंसानियत के दोस्त थे। उनकी शख्सियत में एक अजीब सी कशिश थी; वह जिससे मिलते, उसे अपना बना लेते।

“वो तो खुशबू है, हवाओं में बिखर जाएगा,
मसला फूल का है, फूल किधर जाएगा?”

आज उनकी कमी का सबसे ज़्यादा एहसास उन बेसहारा परिवारों को होता है, जिनकी दहलीज पर ख़लील साहब चुपचाप मदद पहुँचा दिया करते थे। उन्होंने कभी शोहरत की तमन्ना नहीं की, कभी ऊँचे मंचों की चाहत नहीं रखी। वह तो बस उन तंग गलियों के मुसाफ़िर थे, जहाँ उम्मीद की रौशनी पहुँचानी थी। आज उनकी वह खाली कुर्सी हमें चिढ़ाती है, वह घर की दहलीज़ उनका इंतज़ार करती है, और वह रास्ते जिन पर चलकर वह तालीम का पैग़ाम फैलाते थे, आज भी उनके कदमों की आहट ढूँढते हैं।

जब वह रुख़सत हुए, तो ऐसा लगा जैसे बस्ती के हर घर का चूल्हा ठण्डा पड़ गया हो। वह शख्स जो सबकी मुश्किलों का हल था, खुद मिट्टी की चादर ओढ़कर सो गया। उनकी यादों के जुगनू आज भी हमारी पलकों पर झिलमिलाते हैं। उनकी वह कुर्सी, वह सादा सा अंदाज़ और वह शफ़क़त भरी नसीहतें—सब कुछ आज भी हमारे ज़हन में ज़िंदा है।

“हमें तो जान से प्यारे थे वो मगर अफ़सोस,
कि मौत को भी बहुत प्यारी थी वफ़ा उनकी।”

ख़लील साहब का परिवार आज भी उनकी उन यादों के सहारे जी रहा है, जो वह विरासत में छोड़ गए। उनके आँखों में आज भी वह अक़्स झलकता है, जो उन्होंने समाज की बेहतरी के लिए देखा था।

ख़लील साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनका मिशन—’हर बच्चा पढ़ेगा’—हमारे कंधों पर एक अमानत है। उन्हें याद करने का सबसे बेहतरीन तरीका यह नहीं कि हम सिर्फ आँसू बहाएं, बल्कि यह है कि हम उनके छोड़े हुए चिरागों को बुझने न दें।

“तू अगर चला गया तो क्या, तेरा नक्श-ए-पा तो है,
मंज़िल की ज़ुस्तज़ू में अभी रास्ता तो है।”

आज उनकी तीसरी बरसी पर हम सब का दिल ग़मगीन है, मगर हमारा हौसला बुलंद है। ख़लील अहमद साहब ने जो शम्अ जलाई थी, उसे बुझने नहीं देना ही उन्हें सच्ची खिराज-ए-अकीदत होगी।

ख़लील साहब! आप जहाँ भी होंगे, यक़ीनन जन्नत की ठंडी हवाएँ आपके कदमों को चूम रही होंगी। आपने जो बीज बोया था, वह अब एक घना दरख़्त बन रहा है। आपकी यादें हमारी आँखों में नमी बनकर तो रहेंगी ही, लेकिन आपका मिशन हमारी बाज़ुओं की ताकत बनकर ज़िंदा रहेगा।

“आसमान तेरी लहद (कब्र) पर शबनम अफ़शानी करे, सब्ज़ा-ए-नौरस्ता इस घर की निगहबानी करे।”

ऐ मौला! हमारे समाजी ज़िंदगी के मक़बूल उस्ताद मरहूम ख़लील साहब की मग़फ़िरत फ़रमा। उन्होंने तेरी मख्लूक की ख़िदमत में कोई कसर नहीं छोड़ी, तू भी अपनी रहमतों में कोई कमी न रखना। उनकी लहद (कब्र) को जन्नत की हवाओं से मुअत्तर कर दे और उनके अहले-खाना को यह हौसला दे, जो सिर्फ तू दे सकता है कि वह उनकी विरासत को ज़मज़मा रख सकें। आमीन!

“तुम्हें हम भूल जाएँ ये मुमकिन नहीं ‘ख़लील’,
तुम तो दुआ बनकर हमारे लबों पर रहोगे।”

Mohammad Salauddin

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