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जयपाल सिंह, जिन्हें मारंग गोमके के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेताओं में से एक थे। बिर्सा मुंडा के बाद उनका योगदान आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनके जीवन और अनुभवों को लो बिर सेंद्रा: अ हंटर इन द बर्निंग फॉरेस्ट में विस्तार से लिखा गया है। यह किताब उनके व्यक्तिगत संस्मरणों पर आधारित है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन के हर पहलू—खेल, शिक्षा, राजनीति और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई, को दर्शाया है।
जयपाल सिंह का जन्म 1903 में टकरा गाँव, रांची में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा और प्रतिभा ने उन्हें इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड तक पहुँचाया। वहां उन्होंने हॉकी में ओलंपिक गोल्ड जीतने के साथ-साथ भारतीय सिविल सेवा में चुने जाने जैसे बड़े मुकाम हासिल किए। लेकिन उनकी असली पहचान उन्हें उनके आदिवासी समाज की सेवा में मिली। उन्होंने हमेशा आदिवासियों की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान को मजबूत बनाने का प्रयास किया।
आदिवासी अधिकारों की लड़ाई
जयपाल सिंह ने 1939 में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष के रूप में आदिवासी संगठनों को एकजुट किया। उनका उद्देश्य था झारखंडी पहचान को मान्यता दिलाना और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करना। उन्होंने भाषणों में आदिवासी रीति-रिवाजों, जीवनशैली और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को प्रमुखता से रखा। उनके नेतृत्व में चोटी नागपुर और संथाल परगना के लिए अलग प्रशासनिक पहचान की मांग उठी, और चुनावों में आदिवासी महासभा को महत्वपूर्ण सफलता मिली।
आदिवासी पहचान और संवैधानिक योगदान
जयपाल सिंह संविधान सभा के सदस्य भी रहे और उन्होंने आदिवासियों की परंपराओं, अधिकारों और जीवनशैली को संविधान में सुरक्षित करने का प्रयास किया। उन्होंने तीर, धनुष और कुल्हाड़ी जैसी पारंपरिक आदिवासी गतिविधियों के अधिकार को बनाए रखने की बात उठाई। वे महिलाओं के प्रतिनिधित्व के भी पक्षधर थे और आदिवासी महासभा में महिला संगठनों को सक्रिय रूप से शामिल किया।
हालांकि, उनके विचार कभी-कभी पश्चिमी और उपनिवेशवादी दृष्टिकोणों से प्रभावित थे। ‘जंगली’ या आदिवासी शब्द को लेकर उनके दृष्टिकोण ने कुछ विवाद भी खड़े किए, क्योंकि इसे कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं माना गया। इसके बावजूद, उन्होंने आदिवासी समाज की अलग पहचान, स्वायत्तता और सांस्कृतिक गर्व को प्रमुखता दी।
स्वायत्तता की लंबी लड़ाई
स्वतंत्रता के बाद भी जयपाल सिंह ने झारखंड की अलग पहचान के लिए संघर्ष जारी रखा। 1950 में आदिवासी महासभा को झारखंड पार्टी के रूप में पुनर्गठित किया गया। उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग उठाई, लेकिन राजनीतिक चुनौतियों और कांग्रेस के दबाव के कारण यह प्रयास तत्काल सफल नहीं हो सका। उनके जीवन में कई असफलताएँ आईं, लेकिन उनकी कोशिशों ने भविष्य में झारखंड राज्य के गठन की नींव रखी।
संस्कृति और परंपराओं की धरोहर
जयपाल सिंह ने आदिवासी परंपराओं और रीति-रिवाजों को भी दस्तावेजीकृत किया। ‘लो बिर सेंद्रा’ में उन्होंने आदिवासी शिकार, सामुदायिक जीवन, विवाह प्रथाओं और महिलाओं की भूमिका का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने दिखाया कि आदिवासी समाज लोकतांत्रिक और समानता की भावना से संचालित होता है।
निष्कर्ष
जयपाल सिंह का जीवन आदिवासी पहचान की लड़ाई का प्रतीक है। उनकी उपलब्धियाँ सिर्फ खेल और प्रशासन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने आदिवासी अधिकार, सांस्कृतिक स्वतंत्रता और झारखंडी स्वायत्तता की लंबी लड़ाई में अहम योगदान दिया। उनकी विरासत आज भी आदिवासी अधिकारों और पहचान के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
