इतिहास की भूल, वर्तमान की पीड़ा और सामाजिक संतुलन की खोज : कुर्मी समाज और ST की बहस

(कुड़मी अधिकार महारैली, 01 मार्च 2026 के संदर्भ में विशेष आलेख)

डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’

भारत में जब भी किसी समुदाय की पहचान से जुड़ा प्रश्न उठता है, वह केवल नीति या प्रशासन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि वह इतिहास, संस्कृति और सामाजिक आत्मा का प्रश्न बन जाता है। कुर्मी समाज की अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की मांग इसी श्रेणी का प्रश्न है। यह मांग न तो अचानक उभरी है और न ही केवल आरक्षण का विस्तार चाहती है। यह उस ऐतिहासिक विस्थापन की पीड़ा से उपजी है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल की प्रशासनिक भूलों में दबी पड़ी हैं।

1931 : जब एक कलम ने पहचान बदल दी

भारत में “आदिवासी” की अवधारणा अंग्रेजों की बनाई हुई नहीं थी, लेकिन उसके प्रशासनिक वर्गीकरण अवश्य अंग्रेजी थे। 1872 से 1921 तक की जनगणनाओं में कुर्मी समाज को Aboriginal, Hill Tribe, Primitive Tribe, Tribal Agricultural Community जैसी श्रेणियों में रखा गया। वे जंगल-पहाड़ से जुड़े, परंपरागत कृषक और आधुनिक प्रशासनिक तंत्र से दूर रहने वाले समुदाय थे, ठीक वही मानक जिन्हें आज अनुसूचित जनजाति के रूप में पहचाना जाता है।

1931 की जनगणना में ब्रिटिश शासन ने एक नया पुनर्वर्गीकरण किया “Primitive Tribe” और “Agricultural Caste”। चूँकि कुर्मी अपेक्षाकृत बेहतर कृषक थे, उन्हें पहली श्रेणी से हटाकर दूसरी में डाल दिया गया। यह कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि प्रशासनिक सुविधा का निर्णय था। पर यही निर्णय आगे चलकर उनके इतिहास की सबसे बड़ी कीमत बन गया।

1950 में जब संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत पहली एसटी सूची बनी, तो उसका आधार 1931 की वही जनगणना बनी। जो समुदाय उस वर्ष “Primitive Tribe” माने गये, वे एसटी बन गये और जो हटाये गये, वे सूची से बाहर रह गये। इस तरह कुर्मी समाज अनुसूचित जाति से “हटाया” नहीं गया, बल्कि एक ऐतिहासिक चूक के कारण सूची से बाहर रह गया।

अनुसूचित जाति सूची : बंद किताब नहीं, जीवंत दस्तावेज़

भारतीय संविधान अनुसूचित जाति सूची को “सीलबंद” सूची नहीं मानता। अनुच्छेद 342 में संशोधन की पूरी संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है। इतिहास गवाह है कि अनेक समुदाय, जैसे धांगड़, सहरिया, गोंड, खड़िया आदि को बाद के वर्षों में ST सूची में शामिल किया गया। अतः कुर्मी समाज की मांग संविधान विरोधी नहीं, बल्कि उसी की आत्मा सामाजिक न्याय के अनुरूप कही जा सकती है।

पर आदिवासी समाज की पीड़ा भी वास्तविक है

इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बंगाल के कई आदिवासी समुदाय इस मांग को लेकर असहज और नाराज़ हैं। उनकी चिंता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक और अस्तित्वगत है।

अनुसूचित जाति के भीतर मिलने वाली छात्रवृत्ति, छात्रावास, आरक्षण, वनाधिकार और भूमि सुरक्षा जैसी सुविधाएँ पहले से ही सीमित हैं। बड़े जनसंख्या समूह के जुड़ने से उनके हिस्से के अवसर कम हो जाने का भय वास्तविक है। इसके साथ ही उन्हें यह आशंका भी है कि कहीं उनकी विशिष्ट पहचान एक बड़े सामाजिक समूह में विलीन न हो जाए।

यह चिंता सामाजिक असंतुलन की चेतावनी है, जिसे अनदेखा करना स्वयं आदिवासी अस्मिता के साथ अन्याय होगा।

न्याय बनाम संतुलन की चुनौती

इस प्रश्न का समाधान “या तो कुर्मी या आदिवासी” के द्वंद्व में नहीं है। यह प्रश्न है कि इतिहास की गलती कैसे सुधारी जाए, बिना किसी दूसरे समुदाय के अधिकारों को कमजोर किए।

यदि कुर्मी समाज के ऐतिहासिक तर्क प्रमाणित होते हैं, तो समाधान यह होना चाहिए कि अनुसूचित जाति के भीतर उप-श्रेणीकरण, संसाधनों का विस्तार और विशेष सुरक्षा उपाय जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार हो। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल किसी को जोड़ना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी और का हक न घटे।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि कुर्मी समाज की मांग केवल नए अधिकार की नहीं, बल्कि खोई हुई पहचान की वापसी की मांग है। वहीं आदिवासी समाज की चिंता वर्तमान अधिकारों की सुरक्षा की आवाज़ है।

इस बहस में जीत-हार नहीं, बल्कि संतुलन और न्याय की खोज होनी चाहिए। क्योंकि इतिहास की गलती सुधारते समय, किसी और का वर्तमान बिगड़ जाए तो वह भी एक नई ऐतिहासिक भूल बन जाएगी। आज असली प्रश्न यह नहीं है कि “कुर्मी ST क्यों बनें?” बल्कि यह है कि क्या हम न्याय करते हुए संतुलन बनाए रख पाएँगे?

परिचय– लेखक Ranchi University के यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ नागपुरी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और रांची में अकादमिक एवं शोध गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।

(नोट- इस आलेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं, इसका ulgulan.in से कोई लेना-देना नहीं है)

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