झारखंड में केंद्र की बड़ी पर्यावरण योजना, जंगलों की मिट्टी और जल स्रोतों पर होगा वैज्ञानिक अध्ययन
Ranchi
झारखंड में 30 हजार से अधिक पुराने वृक्षों की जेनेटिक मैपिंग की जाएगी। इस पहल का उद्देश्य पिछले 100 वर्षों में मौसम में आए बदलाव, जंगलों की मिट्टी की प्रकृति और पारिस्थितिकी संतुलन को समझना है। केंद्र सरकार ने इसके लिए विस्तृत योजना तैयार की है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य में पुराने वृक्षों की पहचान कर उनका आनुवांशिक डाटाबेस तैयार करने के निर्देश दिए हैं। वनस्पति विशेषज्ञ इस अध्ययन में शामिल होंगे। इस प्रक्रिया से यह पता लगाया जाएगा कि किस दौर में किस तरह का मौसम प्रभावी रहा और उसका जंगलों पर क्या असर पड़ा।
दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता विवेक चौधरी के अनुसार, इस अध्ययन से जंगलों में मौजूद जल स्रोतों की स्थिति की भी जानकारी मिलेगी। वृक्षों की उम्र, उनकी वृद्धि की गति और लंबे समय तक टिके रहने के कारणों का भी विश्लेषण किया जाएगा।
बदलते मौसम और मिट्टी का असर
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले सौ वर्षों में मौसम में बदलाव आया है और मिट्टी भी अपरदन का शिकार हुई है। साल, शीशम, गम्हार और महुआ जैसे पेड़ झारखंड की पहचान रहे हैं, लेकिन पिछले करीब 25 वर्षों से इनका प्राकृतिक विकास कम हुआ है। जेनेटिक अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि इसके पीछे कौन से कारण जिम्मेदार हैं।
जल स्रोतों की भी होगी पहचान
पर्यावरणविद और रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भ शास्त्र विभाग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जल स्रोत वृक्षों के स्थायी विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। रांची के आसपास अनगढ़ा से ओरमांझी तक कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां जल स्रोतों के कारण प्राकृतिक रूप से पौधे उग रहे हैं।
इस अध्ययन की रिपोर्ट राज्य के वन एवं पर्यावरण विभाग के साथ साझा की जाएगी। इससे भविष्य में वृक्षारोपण, संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने की योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू किया जा सकेगा। सारंडा और साहिबगंज के जंगलों में मौजूद पुराने वृक्षों का डाटा भी इस परियोजना में शामिल किया जाएगा।
