वे आदिवासी भाषाएं, जिनको बचाने की है जरूरत

झारखंड की मातृभाषाएँ : अस्मिता की जड़ें और अस्तित्व की पुकार

डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया

भारत की भाषाई विविधता विश्व में अद्वितीय मानी जाती है, और इस विविधता का सजीव, जीवंत और संघर्षशील रूप झारखंड में दिखाई देता है। झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा, जंगलों और जनजातीय जीवन से ही नहीं, बल्कि उसकी मातृभाषाओं से भी निर्मित होती है। यहाँ की भाषाएं लोकजीवन की स्मृति, इतिहास, ज्ञान और सांस्कृतिक चेतना की संवाहक हैं। मातृभाषा दिवस के अवसर पर यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या हम इन भाषाओं के संरक्षण के प्रति पर्याप्त गंभीर हैं?

झारखंड में पारंपरिक निवासियों की मातृभाषाओं की संख्या एक दर्जन से अधिक मानी जाती है। स्थिति और संस्थागत समर्थन के आधार पर इन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहली श्रेणी में वे भाषाएं हैं जिन्हें विद्यालय से विश्वविद्यालय स्तर तक भाषा-विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है, जैसे – संताली, मुंडारी, हो, खड़िया, कुड़ुख, खोरठा, कुरमाली, नागपुरी और पंचपरगनिया। दूसरी श्रेणी में वे भाषाएं आती हैं जो अब भी मुख्यतः मौखिक परंपरा और लोक-साहित्य के सहारे जीवित हैं, जैसे – असुरी, बिरहोरी, बिरजिया, भूमिज, मालतो आदि।

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो झारखंड की प्रमुख भाषाओं को अकादमिक पहचान दिलाने की प्रक्रिया बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तेज हुई। लगभग चार दशक पूर्व इन भाषाओं की पढ़ाई स्नातकोत्तर स्तर पर प्रारंभ की गई। धीरे-धीरे इन्हें स्कूली पाठ्यक्रम में भी स्थान मिला। आज कुछ भाषाएं आठवीं कक्षा तक तथा संताली, मुंडारी और कुँड़ुख़ पाँचवीं कक्षा तक पाठ्यचर्या में शामिल हैं। यह उपलब्धि महत्त्वपूर्ण अवश्य है, परंतु पर्याप्त नहीं।

भाषाई संकट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता व्यक्त की गई है। यूनेस्को के आकलनों के अनुसार झारखंड की कई भाषाएं आने वाले दशकों में विलुप्ति के कगार पर पहुँच सकती हैं। विशेष रूप से असुरी, बिरहोरी, बिरजिया, भूमिज और मालतो जैसी भाषाएं अत्यधिक जोखिमग्रस्त मानी जाती हैं। इन भाषाओं के बोलने वालों की संख्या सीमित है, नई पीढ़ी का झुकाव संपर्क और रोजगार की भाषाओं की ओर अधिक है, और लिखित सामग्री का अभाव इनके भविष्य को और अस्थिर बनाता है।

झारखंड में वर्तमान में 32 जनजातियाँ सूचीबद्ध हैं, किंतु प्रचलित जनजातीय भाषाओं की संख्या दस से कम है। इसका अर्थ यह है कि अनेक जनजातीय समुदाय अपनी मूल जातिगत भाषा से दूर होकर क्षेत्रीय सदानी भाषाओं – खोरठा, कुरमाली, नागपुरी या पंचपरगनिया को ही मातृभाषा के रूप में अपनाए हुए हैं। ये भाषाएं सदियों से जनजाति और गैर-जनजाति समुदायों के बीच संपर्क भाषा का कार्य करती रही हैं। इस दृष्टि से ये केवल भाषाएं नहीं, सामाजिक सेतु हैं।

राज्य स्तर पर नौ भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने का निर्णय ऐतिहासिक था, पर व्यवहारिक धरातल पर इसके अनुरूप ठोस कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाई की अनुमति तो दी गई, पर पद-सृजन और शिक्षक – नियुक्ति पर्याप्त नहीं हुई। कई संस्थानों में वर्षों से प्रस्ताव लंबित हैं। पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन का कार्य भी व्यापक रूप से सरकारी स्तर पर व्यवस्थित नहीं हो सका है, स्वैच्छिक भाषा-संगठन सीमित संसाधनों से यह दायित्व निभा रहे हैं।

एक गंभीर समस्या मानकीकरण की भी है। झारखंडी भाषाएं लंबे समय तक अलिखित और लोक-व्यवहार आधारित रही हैं। लिखित रूप अपेक्षाकृत नया है। परिणामस्वरूप एक ही भाषा के अनेक क्षेत्रीय रूप लिखित प्रयोग में दिखाई देते हैं। प्रतियोगिता परीक्षाओं में व्याकरणिक मानकों को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। इस स्थिति के समाधान के लिए एक सशक्त राज्य स्तरीय भाषा-साहित्य अकादमी की स्थापना अत्यंत आवश्यक है, जो वैज्ञानिक आधार पर मानक रूप, शब्दकोश, व्याकरण और वर्तनी-निर्देश तैयार कर सके।

भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह सामूहिक चेतना का घर होती है। किसी समुदाय का लोकज्ञान, प्रकृति-बोध, श्रम-संस्कृति, उत्सव, मिथक और स्मृतियाँ मातृभाषा में ही सुरक्षित रहती हैं। लोकभाषा के बिना लोकसंस्कृति गूँगी हो जाती है। झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता का आधार उसकी लोकसंस्कृति जितना है, उतना ही उसकी मातृभाषाएं भी हैं।

आज आवश्यकता केवल भावनात्मक अपील की नहीं, बल्कि नीतिगत प्रतिबद्धता की है। मातृभाषा आधारित प्रारंभिक शिक्षा, डिजिटल अभिलेखन, लोक-साहित्य का संकलन, अनुवाद परियोजनाएं, पत्र-पत्रिकाओं को विशेष प्रोत्साहन, और भाषा-शोध के लिए संस्थागत सहयोग। समुदाय, शिक्षण संस्थान और सरकार, तीनों की साझी जिम्मेदारी से ही यह भाषाई धरोहर सुरक्षित रह सकती है।

मातृभाषा दिवस हमें स्मरण कराता है कि भाषा बचाना, दरअसल मनुष्य की स्मृति और पहचान बचाना है। झारखंड की मातृभाषाएं केवल शब्द नहीं, यह धरती की धड़कन हैं। इन्हें सुनना, सहेजना और आगे बढ़ाना हमारा सामूहिक कर्तव्य है।

डॉ बीरेंद्र कुमार महतो: यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ नागपुरी, रांची यूनिवर्सिटी, रांची, झारखंड

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