LOHARDAGA
1832 के लरका आंदोलन के नायक अमर शहीद वीर बुधु भगत की 194वीं जयंती मंगलवार को मैना बगीचा स्थित प्रतिमा स्थल पर श्रद्धा, उत्साह और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की भागीदारी रही।
मुख्य अतिथि के रूप में झारखंड सरकार की ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, लोहरदगा सांसद सुखदेव भगत, कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर, कृषि विपणन पार्षद अध्यक्ष रविंद्र सिंह, पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष अनुपमा भगत, डीसी डॉ. ताराचंद, एसपी सादिक अनवर रिजवी, डीडीसी दिलीप प्रताप सिंह शेखावत सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

अतिथियों ने वीर बुधु भगत की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रीति-रिवाज से पाहन सोमा पाहन, सुभाष पाहन, विनोद उरांव एवं अन्य पुजारियों द्वारा पूजा-अर्चना से हुई।
मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि शहीद कभी मरते नहीं, वे समाज की चेतना में जीवित रहते हैं। उन्होंने कहा कि शहीदों की कुर्बानियों को देश सदैव याद रखेगा। उन्होंने झारखंड में लागू पेशा कानून को कांग्रेस सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि विपक्ष इस मुद्दे पर जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा है।
सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि वीर बुधु भगत देश के प्रारंभिक स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रणी थे, जिन्होंने 1832 में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने पुत्रों हलधर और गिरधर के साथ शहादत दी। उन्होंने युवाओं से नशामुक्ति और शिक्षा के प्रति जागरूक रहने की अपील की।

जयंती समारोह के अवसर पर जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से आए खोड़हा दलों ने पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में ढोल, नगाड़ा और मांदर की थाप पर मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। सांसद सुखदेव भगत सहित अन्य अतिथियों ने भी नगाड़ा बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। आयोजन समिति द्वारा प्रकाशित स्मारिका का सामूहिक विमोचन भी किया गया।
समारोह स्थल पर जत्रा सह विकास मेले का भी आयोजन किया गया, जहां हिंडाल्को समेत विभिन्न विभागों ने स्टॉल लगाकर सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी दी। लोकनृत्य, गीत और पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से झारखंड की संस्कृति और विरासत की झलक देखने को मिली।
मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि पुरखों की शहादत को याद रखना और नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से परिचित कराना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्थाओं को सशक्त बनाने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।

