मिनिस्टर के बुलावे पर झारखंड आयेंगे “मोहम्मद दीपक’, जानिए कैसे और क्यों फेमस हो गये दीपक


देहरादून जाकर करेंगे सम्मान, ₹2 लाख की राशि भेंट कर भाईचारे का संदेश देंगे मंत्री


RANCHI

झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जानकारी दी है कि मोहम्मद दीपक ने उनका झारखंड आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। मंत्री ने कहा कि दीपक से हुई उनकी भावनात्मक बातचीत ने एक बार फिर यह भरोसा मजबूत किया कि देश की असली ताकत भाईचारे, इंसानियत और धर्मनिरपेक्षता में है।

डॉ अंसारी ने अपने संदेश में एक शेर भी साझा किया और कहा कि समाज में जब नफरत फैलाने की कोशिशें हो रही हैं, ऐसे समय में दीपक जैसे युवाओं का साहस नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।

उन्होंने घोषणा की कि बजट सत्र के बाद झारखंड में मोहम्मद दीपक का भव्य स्वागत किया जाएगा। मार्च के बाद हजारों लोगों की मौजूदगी में उनका सम्मान समारोह आयोजित होगा।

स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी कहा कि वे स्वयं देहरादून जाकर दीपक को सम्मानित करेंगे और ₹2,00,000 की सम्मान राशि भेंट करेंगे। उन्होंने इसे केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव और एकता का संदेश बताया। अपने पोस्ट के अंत में डॉ अंसारी ने लोगों से भाईचारा और विकास को चुनने का आह्वान किया।

कौन हैं मोहम्मद दीपक

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक नाम बार-बार उभर रहा है—मोहम्मद दीपक। ट्विटर से लेकर इंस्टाग्राम तक, हर जगह इसी नाम की चर्चा है। सियासी गलियारों में भी यह नाम गूंज रहा है—राहुल गांधी से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक, अलग-अलग विचारधाराओं के लोग एक ही शख्स की बात कर रहे हैं। सवाल स्वाभाविक है—आखिर यह मोहम्मद दीपक कौन हैं? क्या यह उनका असली नाम है या इसके पीछे कोई कहानी छिपी है?

इस कहानी की शुरुआत होती है उत्तराखंड के कोटद्वार से। वही कोटद्वार जिसे अक्सर “उत्तराखंड का द्वार” कहा जाता है—पहाड़ों की तरफ जाने का प्रवेश बिंदु। यहीं के रहने वाले हैं दीपक कुमार, जिनका नाम अचानक “मोहम्मद दीपक” बनकर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। सुनने में यह नाम अजीब लगता है—जैसे दो अलग धार्मिक पहचानें एक साथ जोड़ दी गई हों। लेकिन हकीकत में यह एक प्रतीकात्मक नाम है, जिसे उन्होंने एक खास परिस्थिति में खुद के लिए इस्तेमाल किया।

दीपक कुमार पेशे से जिम ट्रेनर हैं। पिछले लगभग तीन दशकों से वह फिटनेस की दुनिया में सक्रिय हैं। कोटद्वार के बद्रीनाथ मार्ग के पास उनका जिम है, जहां वे युवाओं को बॉडी बिल्डिंग और फिटनेस की ट्रेनिंग देते हैं। उनकी पहचान सिर्फ एक ट्रेनर की नहीं, बल्कि एक मेंटर की भी है। उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई भी कोटद्वार में की और श्रीनगर गढ़वाल विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया। बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए वह मुंबई तक पहुंचे और एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में टॉप सिक्स में जगह बनाई।

उनका पारिवारिक जीवन बेहद साधारण है। करीब 15 साल पहले उनके पिता का निधन हो चुका है। वह शादीशुदा हैं और एक बेटी के पिता हैं। उनकी मां आज भी कोटद्वार में एक छोटी सी चाय की दुकान चलाती हैं। घर की आमदनी का बड़ा हिस्सा जिम से ही आता है, साथ ही दीपक सोशल मीडिया पर भी फिटनेस टिप्स साझा करते हैं।

फिर आया 26 जनवरी 2026 जब देश अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा था। उसी दिन कोटद्वार में एक दुकान के नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया। “बाबा स्कूल गारमेंट्स” नाम की दुकान पर कुछ हिंदूवादी संगठनों ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि मुस्लिम दुकानदार “बाबा” शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि यह शब्द हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ा है और खासकर कोटद्वार के प्रसिद्ध सिद्धबली हनुमान मंदिर से इसकी भावना जुड़ती है।

दुकान के मालिक वकील अहमद ने जवाब दिया कि उनकी दुकान करीब 30 साल पुरानी है और इतने सालों में कभी किसी ने नाम पर सवाल नहीं उठाया। उनका तर्क था कि “बाबा” शब्द किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है; यह अलग-अलग संदर्भों में कई समुदायों में बोला जाता है।

इसी बहस के बीच दीपक कुमार वहां पहुंचे। उन्होंने दोनों पक्षों से बात करने की कोशिश की। जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अचानक खुद को “मोहम्मद दीपक” कह दिया। यही वह क्षण था जिसने पूरी कहानी को नया मोड़ दे दिया। यह नाम उन्होंने किसी धार्मिक पहचान बदलने के लिए नहीं, बल्कि एक संदेश देने के लिए लिया, कि इंसान की पहचान उसके नाम या धर्म से नहीं, उसके कर्म और सोच से होनी चाहिए।

बाद में उन्होंने साफ किया कि उनका मकसद किसी को उकसाना नहीं था, बल्कि यह बताना था कि भारत में हर नागरिक को बराबरी से जीने और काम करने का हक है। किसी को सिर्फ उसके नाम या धर्म के आधार पर निशाना बनाना गलत है। उनके मुताबिक, उस समय उनके मुंह से “मोहम्मद दीपक” यूं ही निकला, लेकिन उसमें एक प्रतीक छिपा था—दो पहचानों को जोड़कर एक इंसानी पहचान को सामने रखना।

इस घटना के बाद उनका जीवन अचानक बदल गया। सोशल मीडिया पर उनके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े। लोग उनके समर्थन में पोस्ट और रील बनाने लगे। लेकिन दूसरी तरफ, स्थानीय स्तर पर उन्हें मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा। जिम का काम कुछ समय के लिए प्रभावित हुआ। घर की जिम्मेदारियां बनी रहीं, और उनकी मां अपनी चाय की दुकान पर पहले की तरह जुटी रहीं।

दीपक का कहना है कि वह खुद को किसी खास धार्मिक पहचान में बांधकर नहीं देखते। उनके लिए सबसे बड़ी पहचान इंसानियत है। उनका मानना है कि पूजा-पाठ या इबादत हर व्यक्ति का निजी अधिकार है, लेकिन नफरत फैलाकर समाज को तोड़ना किसी के हित में नहीं। उनके शब्दों में, आखिर में इंसान के कर्म ही मायने रखते हैं—नाम नहीं।

“मोहम्मद दीपक” इसलिए सिर्फ एक नाम नहीं रहा, बल्कि एक बहस का केंद्र बन गया—पहचान, सहअस्तित्व और नागरिक अधिकारों पर। यह कहानी एक छोटे शहर से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची, और इसने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया कि हम किसी व्यक्ति को उसके नाम से पहचानते हैं या उसके काम से।


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