डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’
नीमहांस-2 की घोषणा को यदि केवल “स्वास्थ्य सुविधा का विस्तार” कहकर सराहा जाए, तो यह आधा सच होगा और आधा सच कई बार पूरे झूठ से भी अधिक ख़तरनाक होता है। झारखंड के आदिवासी समाज के संदर्भ में यह सवाल कहीं ज़्यादा बुनियादी है कि आख़िर इतनी महँगी और विशिष्ट मानसिक स्वास्थ्य संस्था की ज़रूरत ही क्यों पड़ी? और उससे भी अधिक ज़रूरी यह कि इस स्थिति को पैदा करने का दोष किस पर है?
झारखंड उस विडंबना का नाम है, जहाँ ज़मीन के नीचे अकूत संपदा है, लेकिन ज़मीन के ऊपर रहने वाले लोग आज भी अभाव, असुरक्षा और अपमान का जीवन जीने को विवश हैं। यहाँ का आदिवासी समाज केवल लोकगीत, पर्व-त्योहार और सामुदायिक जीवन का प्रतिनिधि नहीं है, बल्कि वह निरंतर विस्थापन, शोषण और सत्ता-प्रायोजित उपेक्षा का जीवित दस्तावेज़ भी है। जल-जंगल-ज़मीन से बेदखली, खनन परियोजनाएँ, बाँध, औद्योगिक कॉरिडोर, सुरक्षा के नाम पर सैन्यीकरण और प्रशासनिक दमन, इन सबने मिलकर आदिवासी जीवन की सामाजिक ही नहीं, मानसिक संरचना पर भी गहरे घाव दिए हैं।
मानसिक स्वास्थ्य कोई अचानक पैदा होने वाली बीमारी नहीं होती। यह किसी व्यक्ति की निजी असफलता भी नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की उपज होता है। जब पीढ़ियों से बसे गाँव उजाड़ दिए जाते हैं, जब जंगल और खेत छिन जाते हैं, जब आजीविका असुरक्षित हो जाती है, जब भाषा और संस्कृति को “पिछड़ापन” कहकर हाशिये पर धकेला जाता है, जब आदिवासी युवाओं को या तो बंदूक़ उठाने वाला समझ लिया जाता है या संभावित अपराधी तो अवसाद, चिंता, आत्महत्या और नशा केवल व्यक्तिगत समस्याएँ नहीं रह जातीं, वे राज्य की नीतियों की सामूहिक असफलता बन जाती हैं।
यहीं वह उदाहरण सटीक बैठता है कि
“किसी को लगातार पीटा जाए, फिर उसके ज़ख़्म पर सस्ती दवा लाकर कहा जाए कि देखो, हमने इलाज कर दिया।”
पर यह नहीं पूछा जाए कि मार किसने की, क्यों की और उसे रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी थी।
नीमहांस-2 की ज़रूरत इसलिए नहीं पड़ी कि आदिवासी समाज “कमज़ोर मानसिकता” का है, बल्कि इसलिए पड़ी क्योंकि विकास की मौजूदा परिभाषा ने उसे लगातार मानसिक रूप से घायल किया है। योजनाएँ बनीं, लेकिन ग्रामसभा की सहमति के बिना। क़ानून बने, लेकिन पेसा और वनाधिकार अधिनियम जैसे संवैधानिक सुरक्षा-कवच ज़मीन पर निष्क्रिय रहे। स्कूल खुले, लेकिन मातृभाषा को जगह नहीं मिली। स्वास्थ्य केंद्र बने, लेकिन डॉक्टर नहीं पहुँचे। पुलिस पहुँची, पर संवेदनशीलता नहीं।
आज जब बजट में नीमहांस-2 की घोषणा होती है, तो उसे समाधान नहीं, बल्कि एक मौन स्वीकारोक्ति की तरह पढ़ा जाना चाहिए कि कहीं न कहीं राज्य विफल रहा है। लेकिन विफलता स्वीकार करने का साहस तभी पूरा माना जाएगा, जब उसके कारणों की पहचान और ज़िम्मेदारी तय की जाए। यदि आदिवासी इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य संकट है, तो उसके लिए केवल व्यक्ति या समुदाय को दोषी ठहराना एक सुविधाजनक छल है। असली ज़िम्मेदारी उन नीतियों की है, जिन्होंने विकास को विस्थापन का पर्याय बना दिया।
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान आवश्यक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर सवाल यह है कि क्या नीमहांस-2 आदिवासी समाज को केवल “मरीज़” के रूप में देखेगा, या एक ऐसे समुदाय के रूप में, जिसे लंबे समय से नीतिगत हिंसा का शिकार बनाया गया है? क्या वहाँ इलाज केवल दवाओं से होगा, या सामाजिक न्याय, अधिकार और सम्मान की समझ के साथ? क्या वह यह पूछेगा कि मरीज़ बीमार कैसे हुआ, या केवल यह तय करेगा कि उसे कौन-सी दवा देनी है?
अख़बारों, मंचों और सरकारी विज्ञापनों में तालियाँ बजाने से पहले यह याद रखना ज़रूरी है कि दवा की तारीफ़ करना आसान है, लेकिन मारने वाले हाथ की पहचान करना कठिन। झारखंड के आदिवासियों के लिए वास्तविक “मानसिक स्वास्थ्य नीति” तब बनेगी, जब उनके अधिकार सुरक्षित होंगे, उनकी ज़मीन और जंगल सुरक्षित होंगे, उनकी भाषा और संस्कृति को सम्मान मिलेगा और विकास उनके लिए भय नहीं, बल्कि विकल्प बनेगा।
नीमहांस-2 एक ज़रूरत है, इससे इनकार नहीं।
लेकिन उससे पहले और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है यह सवाल पूछना और पूछते रहना कि
आख़िर हमने ऐसा क्या किया कि इस ज़रूरत को पैदा करना पड़ा?
