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असम सरकार के बेदख़ली अभियान के बाद ग्वालपाड़ा ज़िले की जलजली नदी के किनारे सैकड़ों परिवार कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं। तेज़ हवा, ठिठुरन और उड़ती धूल अब इन बेघर लोगों की रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुकी है।
25 वर्षीय नाज़मीना ख़ातून की आवाज़ में बेबसी साफ़ झलकती है। वह बताती हैं कि शाम ढलते ही ठंड असहनीय हो जाती है और रात में टीन की छत पर जमी ओस का पानी सीधे चेहरे पर टपकता है। सर्दी की वजह से उनका बच्चा एक महीने तक बीमार रहा और कई दिनों तक बोल भी नहीं पाया। नाज़मीना का आरोप है कि बेदख़ली के बाद उन्हें किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिली।
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम में छपी रिपोर्ट कहती है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 9 नवंबर को चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान में कुल 588 परिवारों को बेदख़ल किया गया। जिनके पास विकल्प था, वे रिश्तेदारों या किराए के मकानों में चले गए, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनके पास जाने की कोई जगह नहीं बची। ऐसे लोग अपने छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ नदी किनारे रेतीली ज़मीन पर प्लास्टिक और टीन से बनी अस्थायी झुग्गियों में रह रहे हैं।
यह इलाका बारिश के मौसम में पूरी तरह डूबने वाला क्षेत्र माना जाता है। फिलहाल सर्दियों में नदी में पानी कम है, लेकिन मानसून शुरू होते ही यहां रहना असंभव हो जाएगा। ग्वालपाड़ा ज़िले के भाटियापाड़ा और दशभूजा गांव अब पूरी तरह उजड़ चुके हैं। सरकार का दावा है कि ये गांव दहिकाटा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की ज़मीन पर अवैध रूप से बसे थे।
77 वर्षीय हज़रत अली कहते हैं कि नदी किनारे आने के बाद से उनकी सेहत लगातार बिगड़ रही है। पैरों में सूजन और ठंड की वजह से चलना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, उनके बेटे अबुल कलाम हाल ही में ऑपरेशन से गुज़रे हैं और काम करने की स्थिति में नहीं हैं। परिवार दूसरों की मदद के सहारे किसी तरह गुज़ारा कर रहा है।
महिलाओं के लिए हालात और भी कठिन हैं। नाज़मीना बताती हैं कि यहां न पीने का पानी है, न शौचालय और न नहाने की कोई व्यवस्था। महिलाओं को खुले में जाना पड़ता है, जिससे उनकी गरिमा और सुरक्षा दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विकलांग जमुद्दीन निशा, जिनका घर भी तोड़ दिया गया, कहती हैं कि पति की मौत के बाद वह पूरी तरह अकेली हैं। नदी किनारे रहकर ठंड में भीख मांगकर पेट पालना उनकी मजबूरी बन गई है। उनका कहना है कि अरुणदोई योजना से मिलने वाली मदद भी बंद कर दी गई है।
हालांकि प्रशासन ने बेदख़ली के दौरान 21 हिंदू परिवारों को वैकल्पिक ज़मीन दी है, लेकिन बेदख़ल मुस्लिम परिवारों का आरोप है कि उनके साथ भेदभाव किया गया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले ही कह चुके हैं कि राज्य में बेदख़ली अभियान आगे भी जारी रहेगा और लाखों बीघा ज़मीन अतिक्रमण मुक्त कराई जाएगी।
नदी किनारे ठिठुरते इन परिवारों की कहानी सिर्फ बेदख़ली की नहीं, बल्कि उस मानवीय संकट की तस्वीर है, जहां छत छिनने के बाद ज़िंदगी खुद सवाल बनकर खड़ी हो गई है।
